बिग ब्रेकिंग: CAA पर मोदी-शाह के खिलाफ FIR की मांग खारिज, जुर्माने पर अस्थायी रोक

CAA पर मोदी-शाह के खिलाफ FIR की मांग खारिज, जुर्माने पर अस्थायी रोक

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सिटिज़नशिप अमेंडमेंट एक्ट (CAA), 2019 पारित करने को लेकर संवैधानिक पदाधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणी की। हालांकि कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा लगाए गए ₹50,000 के जुर्माने पर फिलहाल रोक लगा दी है।

यह मामला सुप्रीम कोर्ट की बेंच मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाली बागची के समक्ष आया। राजस्थान हाईकोर्ट ने अधिवक्ता पूरन चंद्र सेन पर यह जुर्माना उस याचिका को “फालतू” मानते हुए लगाया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद समेत अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी।

“कानून बनाना अपराध कैसे हो सकता है?”

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने याचिकाकर्ता से पूछा कि यदि संसद कोई कानून पारित करती है, जो किसी की नजर में असंवैधानिक हो सकता है, तो क्या वह अपने आप में अपराध बन जाता है? उन्होंने कहा कि राजनीतिक या सामाजिक विचारों से असहमति अपराध नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ने भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि वकील इस तरह की याचिकाएं दायर करेंगे तो लीगल प्रोफेशन की साख पर सवाल उठेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में ऐसी याचिकाओं पर भारी लागत लगाई जा सकती है।

याचिका वापस, शर्त के साथ राहत

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए याचिका वापस लेने की इच्छा जताई और भविष्य में ऐसी याचिका दायर न करने का आश्वासन दिया।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के उस हिस्से पर अनिश्चितकालीन रोक लगा दी, जिसमें ₹50,000 की लागत जमा कराने का निर्देश था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता अपने आश्वासन का उल्लंघन करता है तो हाईकोर्ट का आदेश स्वतः प्रभावी हो जाएगा।

हाईकोर्ट ने क्यों लगाया था जुर्माना?

राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया था और चार सप्ताह के भीतर लिटिगेंट्स वेलफेयर फंड में ₹50,000 जमा कराने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि CAA लागू होने के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए, जिनमें कई लोगों की मौत और चोटें हुईं। इसी आधार पर उन्होंने IPC की विभिन्न धाराओं के तहत शीर्ष नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की थी।

मजिस्ट्रेट और सेशंस कोर्ट से राहत न मिलने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।