बिग ब्रेकिंग: हाईकोर्ट के बड़े फैसले। 12 महीने में अतिक्रमण पर कार्रवाई, पार्षद को नोटिस, निदेशक को कोर्ट में पेश होने के आदेश

हाईकोर्ट के बड़े फैसले। 12 महीने में अतिक्रमण पर कार्रवाई, पार्षद को नोटिस, निदेशक को कोर्ट में पेश होने के आदेश

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने तीन अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण निर्देश जारी करते हुए प्रशासनिक और संस्थागत जवाबदेही को लेकर सख्त रुख अपनाया है।

अल्मोड़ा स्थित गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान की भूमि पर अतिक्रमण के मामले में न्यायालय ने जिलाधिकारी को समिति गठित कर अतिक्रमणकारियों को चिह्नित करने और रिपोर्ट मिलने के बाद 12 महीने के भीतर उचित कार्रवाई पूरी करने के निर्देश दिए हैं।

वहीं, देहरादून नगर निगम के वार्ड नंबर 98 बालावाला से निर्वाचित पार्षद प्रशांत खरोला को चुनावी याचिका में नोटिस जारी किया गया है।

इसके अलावा राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के एक कर्मचारी की बर्खास्तगी के मामले में न्यायालय ने प्राधिकरण के निदेशक को 19 नवंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

पर्यावरण संस्थान की जमीन से हटेंगे अतिक्रमणकारी, डीएम बनाएंगे समिति

गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, अल्मोड़ा की भूमि पर अतिक्रमण की शिकायतों के मामले में उच्च न्यायालय ने संस्थान को राहत दी है। संस्थान की ओर से शिकायतों के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया गया था।

मामले की सुनवाई के दौरान अतिक्रमणकारियों की ओर से अपना पक्ष रखते हुए कहा गया कि उन्हें हटाने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है और वे अपनी ही भूमि पर काबिज हैं।

दोनों पक्षों को सुनने और तथ्यों पर विचार करने के बाद खंडपीठ ने जिलाधिकारी अल्मोड़ा को निर्देश दिए कि वह एक समिति गठित करें।

समिति अतिक्रमणकारियों को चिह्नित कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी। इसके बाद जिलाधिकारी को रिपोर्ट के आधार पर 12 महीने के भीतर उचित कार्रवाई पूरी करनी होगी।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता स्निग्धा तिवारी ने बताया कि न्यायालय के इस आदेश से पर्यावरण संस्थान को राहत मिली है। अब संस्थान को उम्मीद है कि उसकी भूमि अतिक्रमण मुक्त होगी और उसका उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए किया जा सकेगा।

26 वोट से हारे प्रत्याशी की याचिका पर पार्षद प्रशांत खरोला को नोटिस

देहरादून नगर निगम के वार्ड नंबर 98 बालावाला से निर्वाचित पार्षद प्रशांत खरोला की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ दाखिल चुनावी याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। साथ ही देहरादून जिला न्यायालय से चुनाव याचिका से संबंधित पूरा रिकॉर्ड भी तलब किया है।

यह चुनावी चुनौती उनके प्रतिद्वंद्वी आशीष खत्री ने दी है, जो चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे थे। खत्री महज 26 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे।

उन्होंने प्रशांत खरोला के चुनाव को चुनौती देते हुए आरोप लगाया कि नामांकन के दौरान दाखिल किए गए शपथपत्र में गलत जानकारियां दी गईं और आपराधिक मुकदमों से संबंधित तथ्य छिपाए गए।

याचिका में कहा गया कि शपथपत्र में तिथियों को लेकर भी विसंगतियां हैं। इसके अलावा प्रत्याशी ने अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमे की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 की धारा 45, जिसे उत्तराखंड में वर्ष 2002 में संशोधित किया गया था, के तहत प्रत्याशी को अपने खिलाफ लंबित ही नहीं, बल्कि समाप्त हो चुके आपराधिक मुकदमों का भी खुलासा करना आवश्यक है।

गौरतलब है कि देहरादून जिला न्यायालय ने पूर्व में आशीष खत्री की चुनाव याचिका खारिज कर दी थी। जिला न्यायालय का मानना था कि भले ही आपराधिक मुकदमों की जानकारी छिपाई गई हो, लेकिन इससे चुनाव परिणाम प्रभावित होने की बात साबित नहीं होती।

कुछ अन्य तकनीकी आधारों पर भी याचिका निरस्त की गई थी। अब उच्च न्यायालय ने मामले का रिकॉर्ड तलब करते हुए निर्वाचित पार्षद को नोटिस जारी किया है।

आठ साल से कार्यरत कर्मचारी की बर्खास्तगी पर हाईकोर्ट सख्त, निदेशक तलब

राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण में आठ वर्षों से कार्यरत कर्मचारी पंकज साह की सेवा समाप्ति के मामले में भी उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है।

न्यायालय ने राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण के निदेशक को 19 नवंबर को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं।

पंकज साह को प्राधिकरण ने 7 जनवरी 2026 को सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इसके खिलाफ उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करते हुए कहा कि उन्हें पूर्व में जारी कारण बताओ नोटिस का जवाब देने का अवसर दिया गया था, लेकिन सेवा से बर्खास्तगी जैसा कठोर निर्णय लेने से पहले उनका पक्ष उचित तरीके से नहीं सुना गया।

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी की कि लंबे समय से प्राधिकरण में कार्यरत कर्मचारी को इस तरह सेवा से बर्खास्त कर उसकी जगह किसी अन्य कर्मचारी को नियुक्त करना उसके अधिकारों का हनन प्रतीत होता है।

इसी टिप्पणी के साथ न्यायालय ने प्राधिकरण के निदेशक को 19 नवंबर को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के निर्देश दिए हैं।

तीनों मामलों में उच्च न्यायालय के रुख से स्पष्ट है कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण, चुनावी पारदर्शिता और कर्मचारियों के सेवा संबंधी अधिकारों जैसे मुद्दों पर न्यायालय ने संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं से जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।