बिग ब्रेकिंग: बदरीनाथ चढ़ावा प्रकरण में प्रमोद नौटियाल को हाईकोर्ट से जमानत

बदरीनाथ चढ़ावा प्रकरण में प्रमोद नौटियाल को हाईकोर्ट से जमानत
  • 5 हजार की बरामदगी और CCTV फुटेज पर फिर उठे सवाल

देहरादून। बदरीनाथ धाम में श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई जाने वाली थाली भेंट की गणना में कथित हेराफेरी के बहुचर्चित मामले में आरोपित प्रमोद नौटियाल को उत्तराखंड हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है।

न्यायमूर्ति आलोक महरा की एकलपीठ ने 6 नवंबर को उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने विवेचना पूरी होने, आरोपपत्र दाखिल किए जाने, कथित बरामदगी की परिस्थितियों और न्यायिक हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए जमानत देने का आदेश दिया।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत के स्तर पर मामले के गुण-दोष को लेकर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की जा रही है।

इस आदेश के बाद बदरीनाथ धाम के चढ़ावा प्रकरण में जांच और मंदिर की वित्तीय निगरानी व्यवस्था से जुड़े कई सवाल एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं।

खास तौर पर गिरफ्तारी के 16 दिन बाद पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी, सीसीटीवी फुटेज की उपलब्धता और अन्य कर्मचारियों की भूमिका को लेकर सवाल महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

2 जुलाई को चढ़ावे की गणना के दौरान सामने आया था मामला

बदरीनाथ धाम में 2 जुलाई 2026 को श्रद्धालुओं की ओर से चढ़ाई गई थाली भेंट की नकदी और अन्य सामग्री की गणना के दौरान कथित वित्तीय अनियमितता का मामला सामने आया था।

उस समय बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति (बीकेटीसी) के अध्यक्ष के वैयक्तिक सहायक के रूप में कार्यरत प्रमोद नौटियाल पर गणना स्थल से नकदी और अन्य भेंट सामग्री अपने कब्जे में लेने के आरोप लगे थे।

प्रारंभिक विभागीय जांच में आरोप लगाया गया कि सुबह करीब नौ से साढ़े नौ बजे के बीच गणना के दौरान अनियमितता हुई। मामले के सामने आने के बाद मंदिर समिति ने जांच शुरू कराई।

3 जुलाई को भैरव सेना की ओर से भी मंदिर समिति के मुख्य कार्याधिकारी को लिखित शिकायत दी गई। इसके बाद चार सदस्यीय विभागीय जांच समिति गठित की गई।

जांच के दौरान गणना कक्ष की सीसीटीवी फुटेज खंगाली गई। जांच से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, फुटेज में प्रमोद नौटियाल कथित तौर पर मोबाइल फोन के नीचे नोटों की गड्डी छिपाकर गणना कक्ष से बाहर जाते दिखाई दिए।

पुलिस जांच में 500 रुपये के नोट, सोने-चांदी के सिक्कों के पैकेट, शालिग्राम शिला और केसर का पैकेट अपने कब्जे में लेने के आरोप भी सामने आए।

विभागीय जांच में पांच दिनों के भीतर आठ बार चढ़ावे और दान सामग्री में कथित हेराफेरी किए जाने की बात भी सामने आई थी। इसके अलावा कुछ अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि का अंतिम निर्णय न्यायिक सुनवाई के दौरान साक्ष्यों के आधार पर होगा।

निलंबन से गिरफ्तारी तक ऐसे पहुंचा मामला

प्रकरण सामने आने के बाद मंदिर समिति ने प्रमोद नौटियाल को गणना और प्रोटोकॉल संबंधी जिम्मेदारियों से हटा दिया। 6 जुलाई को उन्हें निलंबित कर दिया गया। इसी बीच शासन ने मंडलायुक्त आनंद स्वरूप की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति गठित की।

8 जुलाई को बीकेटीसी के प्रभारी मंदिर अधिकारी युद्धवीर पुष्पवान की शिकायत पर बदरीनाथ कोतवाली में एफआईआर संख्या 06/2026 दर्ज की गई। शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 306 और 316(5) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ।

मामले की गंभीरता को देखते हुए चमोली पुलिस ने विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया। एसआईटी ने घटनास्थल का निरीक्षण करने के साथ कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए तथा सीसीटीवी फुटेज की जांच की।

पुलिस के अनुसार, 12 जुलाई की रात करीब 10 बजे प्रमोद नौटियाल को देहरादून स्थित उनके आवास से गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।

गिरफ्तारी के 16 दिन बाद हुई थी पांच हजार रुपये की बरामदगी

इस मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कथित बरामदगी की परिस्थितियों को जमानत के पक्ष में महत्वपूर्ण आधार बनाया।

प्रमोद नौटियाल की ओर से अधिवक्ता संदीप तिवारी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को 12 जुलाई को गिरफ्तार किया गया था, जबकि उनके निशानदेही पर पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी 28 जुलाई को दिखाई गई। यानी गिरफ्तारी के 16 दिन से अधिक समय बाद यह बरामदगी हुई।

बचाव पक्ष के अनुसार, पांच हजार रुपये की बरामदगी बदरीनाथ मंदिर परिसर की एक धर्मशाला के कमरे से दिखाई गई थी। यह कमरा सार्वजनिक रूप से श्रद्धालुओं और अन्य लोगों की पहुंच में था। ऐसे में बरामदगी की परिस्थितियों पर सवाल उठते हैं।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि गिरफ्तारी के समय प्रमोद नौटियाल के घर से शालिग्राम मिलने का उल्लेख किया गया, लेकिन इसके अलावा कोई अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई।

अधिवक्ता ने कहा कि प्रमोद नौटियाल देहरादून के स्थायी निवासी हैं, उनके फरार होने की आशंका नहीं है और पुलिस जांच पूरी कर आरोपपत्र दाखिल कर चुकी है। ऐसे में उन्हें लगातार न्यायिक हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।

सरकार ने किया जमानत का विरोध

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध किया गया। हालांकि, सरकार की ओर से इस तथ्य से इनकार नहीं किया गया कि मामले में आरोपपत्र दाखिल हो चुका है और पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी गिरफ्तारी के काफी समय बाद दिखाई गई है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि मामले की विवेचना पूरी हो चुकी है तथा आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है।

अदालत ने पांच हजार रुपये की कथित बरामदगी की परिस्थितियों, गिरफ्तारी और बरामदगी के बीच के अंतर, आरोपों की प्रकृति तथा न्यायिक हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए जमानत देना उचित माना।

इसके बाद अदालत ने प्रमोद नौटियाल की जमानत याचिका स्वीकार कर ली। उन्हें निजी मुचलके और समान राशि के दो विश्वसनीय जमानतदार प्रस्तुत करने पर संबंधित न्यायालय की संतुष्टि के अनुसार रिहा करने का आदेश दिया गया है।

सीसीटीवी फुटेज के 32 दिन गायब होने का सवाल भी चर्चा में

इस पूरे प्रकरण में सीसीटीवी रिकॉर्ड को लेकर भी पहले सवाल उठ चुके हैं। मीडिया रिपोर्टों में सामने आया था कि जांच के दौरान लगभग डेढ़ महीने का रिकॉर्ड ही उपलब्ध था, जबकि उससे पहले के करीब 32 दिनों की फुटेज उपलब्ध नहीं थी।

ऐसे में सवाल उठा था कि मंदिर में चढ़ावे की गणना से संबंधित पुराने सीसीटीवी रिकॉर्ड किस परिस्थिति में उपलब्ध नहीं हो पाए। रिकॉर्ड के रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी और फुटेज उपलब्ध नहीं होने के पीछे तकनीकी कारण थे या कोई अन्य वजह, यह भी जांच का महत्वपूर्ण पहलू रहा है।

हालांकि, हाईकोर्ट के जमानत आदेश में सीसीटीवी फुटेज की प्रामाणिकता या उसमें दिखाई देने वाली गतिविधियों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया है।

अदालत ने जमानत पर विचार करते हुए मुख्य रूप से विवेचना पूरी होने, आरोपपत्र दाखिल होने और कथित बरामदगी की परिस्थितियों को ध्यान में रखा।

अन्य कर्मचारियों की भूमिका और मंदिर समिति की जवाबदेही पर सवाल

विभागीय जांच में पांच दिनों के भीतर आठ बार कथित हेराफेरी किए जाने की बात सामने आई थी। इसके साथ ही कुछ अन्य कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई थी। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस की अंतिम विवेचना और आरोपपत्र में इन पहलुओं को किस तरह शामिल किया गया है।

क्या इस प्रकरण में किसी अन्य कर्मचारी या अधिकारी की भूमिका प्रमाणित हुई? क्या मंदिर की चढ़ावा गणना व्यवस्था में मौजूद खामियों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम उठाए गए?

और क्या सीसीटीवी रिकॉर्ड की अनुपलब्धता के लिए जिम्मेदारी तय की गई? ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब आगे की न्यायिक और प्रशासनिक कार्रवाई से सामने आएगा।

कैमरे बढ़ाने से आगे बढ़कर पारदर्शी व्यवस्था की जरूरत

प्रकरण सामने आने के बाद मंदिर समिति की ओर से गणना स्थल पर बिना जेब वाली ड्रेस अनिवार्य करने और सीसीटीवी कैमरों की संख्या बढ़ाने जैसे कदम उठाए गए थे।

लेकिन बदरीनाथ जैसे प्रमुख धार्मिक स्थल पर चढ़ावे और दान सामग्री की गणना व्यवस्था को पूरी तरह पारदर्शी बनाना केवल कैमरे लगाने तक सीमित नहीं होना चाहिए।

नकदी और सोने-चांदी की सामग्री की गणना के दौरान एक से अधिक कर्मचारियों की मौजूदगी, प्रत्येक सामग्री का लिखित रिकॉर्ड, नियमित मिलान और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं।

प्रमोद नौटियाल को हाईकोर्ट से जमानत मिलना इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम है, लेकिन इससे आरोप समाप्त नहीं हुए हैं।

आरोपों की सत्यता का निर्धारण अब मुकदमे की सुनवाई और पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर होगा। वहीं, बदरीनाथ धाम की चढ़ावा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना मंदिर समिति के सामने अब भी बड़ी चुनौती है।