देहरादून बना साहित्यिक विमर्श का केंद्र, इतिहास, संस्कृति और समाज पर हुई गहन चर्चाएं
देहरादून। राजधानी देहरादून के फेयरफील्ड बाय मैरियट होटल में आयोजित दो दिवसीय ‘द लिटरेरी टेबल’ लिटरेचर एंड आर्ट्स फेस्टिवल का रविवार को भव्य समापन हो गया।
साहित्य, इतिहास, कला, समाज, सैन्य विषयों और पर्यावरण जैसे विविध मुद्दों पर आयोजित इस फेस्टिवल में देश के नामचीन लेखक, इतिहासकार, बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ शामिल हुए।
दो दिनों तक चले इस आयोजन में विचारों, अनुभवों और ज्ञान का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने साहित्य प्रेमियों, विद्यार्थियों और युवाओं को नई दिशा देने का कार्य किया।
फेस्टिवल का उद्घाटन भारतीय रिजर्व बैंक, झारखंड के निदेशक प्रेम रंजन अनिमेष ने किया। उन्होंने कहा कि साहित्य और कला समाज को जोड़ने का सबसे प्रभावी माध्यम हैं तथा ये मानवता, संवाद और वसुधैव कुटुंबकम की भावना को मजबूत करते हैं।
उन्होंने संस्कृत साहित्य के महत्व पर भी प्रकाश डाला। वहीं, दृष्टि आई इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. गौरव लूथरा ने साहित्य को समाज में एकता और संवेदनशीलता का आधार बताया।
पहले दिन पूर्व डीजीपी अशोक कुमार ने साइबर अपराध, कानून-व्यवस्था और पीड़ितों के प्रति पुलिस के व्यवहार जैसे विषयों पर अपने अनुभव साझा किए।
इसके अलावा बची करकरिया, जूही खन्ना, समृद्धि गुलाटी, अजिताभा बोस, मोना वर्मा, जयश्री बनर्जी और अन्य वक्ताओं ने स्मृतियों, इतिहास, सामाजिक बदलाव और समकालीन चुनौतियों पर चर्चा की।
‘इन हॉट ब्लड, कोल्ड प्रिंट’ सत्र में वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका बची करकरिया ने इतिहास, युद्धों और उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों पर अपने विचार रखे।
फेस्टिवल के दूसरे दिन युवा लेखकों को विशेष सम्मान दिया गया।
दून स्कूल, ओएसिस स्कूल और दिल्ली पब्लिक स्कूल के विद्यार्थियों को उनकी पुस्तकों और साहित्यिक रचनात्मकता के लिए सम्मानित किया गया। आयोजकों ने कहा कि युवा पीढ़ी को लेखन और साहित्य की ओर प्रेरित करना इस आयोजन के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
समापन दिवस पर आयोजित विभिन्न सत्रों में साहित्य, इतिहास, स्थापत्य कला, सैन्य रणनीति और पर्यावरण जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई।
प्रसिद्ध लेखक देवदत्त पटनायक ने ‘ए प्लेफुल लुक एट आवर एपिक्स’ सत्र में रामायण, महाभारत और भारतीय पौराणिक कथाओं की विभिन्न व्याख्याओं पर अपने विचार रखे। उन्होंने महाभारत को “पंचम वेद” बताते हुए कहा कि
भारतीय महाकाव्यों को विभिन्न दृष्टिकोणों से समझने की आवश्यकता है। इस दौरान उन्होंने कई प्रश्नों के जवाब देते हुए इतिहास और धार्मिक आख्यानों पर रोचक टिप्पणियां भी कीं।
सैन्य विषयों पर आयोजित सत्र में मेजर जनरल रंजन महाजन ने कश्मीर, सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियानों और भारतीय सेना की भूमिका पर अपने अनुभव साझा किए।
उन्होंने भारतीय सेना के साहस और बलिदान को देश के लिए गौरव का विषय बताया। वहीं, ऑपरेशन सिंदूर, पाकिस्तान और चीन से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा हुई।
‘बोस एनिग्मा डिक्लासिफाइड’ सत्र में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़े रहस्यों और ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा हुई, जबकि ‘आवर लास्ट चांस : द फाइट फॉर मदर अर्थ’ सत्र में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर भास्कर वीरा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन पर जागरूकता का संदेश दिया।
फेस्टिवल की निदेशक और क्यूरेटर डॉ. आलोका दास गुप्ता नियोगी ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य साहित्य, कला और इतिहास के माध्यम से संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना है। उन्होंने कहा कि फेस्टिवल ने लेखकों, पाठकों और युवाओं के बीच विचारों के आदान-प्रदान के लिए एक सशक्त मंच उपलब्ध कराया।
दो दिनों तक चले इस साहित्यिक महोत्सव में बची करकरिया, देवदत्त पटनायक, अशोक कुमार, तरुण महर्षि, समृद्धि गुलाटी, डॉ. रूबी गुप्ता, मोना वर्मा, जयश्री बनर्जी, चंद्रचूड़ घोष, अनुज धर, मेजर जनरल रंजन महाजन सहित अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने सहभागिता की।
आयोजन के समापन के साथ ही साहित्य, इतिहास और सामाजिक विमर्श से जुड़े अनेक विचार प्रतिभागियों के साथ स्मृतियों के रूप में जुड़ गए।


