इधर 34 BAMS छात्रों का दाखिला निरस्त, उधर दून अस्पताल में महिला ने स्वास्थ्य कर्मी को पीटा
देहरादून। उत्तराखंड के स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा क्षेत्र से जुड़े दो अलग-अलग मामलों ने सरकारी और निजी मेडिकल संस्थानों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक ओर दो निजी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेजों में नियमों के विपरीत दिए गए बीएएमएस प्रवेश रद्द होने से 34 छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है।
वहीं दूसरी ओर दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में महिला से कथित अभद्रता और उसके बाद हुए हंगामे ने अस्पताल प्रशासन और सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में ला खड़ा किया है।
भारतीय चिकित्सा पद्धति राष्ट्रीय आयोग (एनसीआईएसएम) ने रुड़की स्थित कोर मेडिकल कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एंड हॉस्पिटल और हरिद्वार के अरोमा आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में सत्र 2022-23 के दौरान हुए 34 बीएएमएस दाखिलों को अवैध घोषित कर दिया है।
आयोग के अनुसार इन छात्रों को राज्य स्तरीय काउंसलिंग प्रक्रिया से प्रवेश नहीं मिला था। जांच में सामने आया कि कोर कॉलेज के 20 और अरोमा कॉलेज के 14 छात्रों के नाम काउंसलिंग सूची में शामिल ही नहीं थे।
एनसीआईएसएम ने स्पष्ट किया कि बीएएमएस की सभी सीटों पर प्रवेश केवल केंद्रीय या राज्य स्तरीय काउंसलिंग के माध्यम से ही संभव है। इसके बावजूद दोनों कॉलेजों ने सीधे दाखिले दे दिए।
अब आयोग ने इन प्रवेशों को निरस्त करते हुए संबंधित छात्रों की आयुष आईडी जारी करने से भी इनकार कर दिया है। मामले में उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय ने भी दोनों कॉलेजों को निर्देश दिए हैं कि छात्र-छात्राओं और उनके अभिभावकों को स्थिति से अवगत कराया जाए।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि दाखिले नियम विरुद्ध थे तो दो वर्षों तक छात्रों की पढ़ाई और फीस प्रक्रिया कैसे चलती रही? अब छात्र और अभिभावक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं और उनके भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हो गई है।
वहीं दूसरी ओर देहरादून स्थित राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में महिला से कथित अभद्रता का मामला बुधवार को फिर गरमा गया।
आरोप है कि एसटीआई विभाग में जांच के दौरान एक काउंसलर ने महिला के साथ अनुचित व्यवहार किया। हालांकि बाद में महिला ने पुलिस को लिखित बयान देकर मामले को गलतफहमी बताया और किसी कानूनी कार्रवाई से इनकार कर दिया था।
लेकिन अगले ही दिन महिला अपनी मां और पति के साथ अस्पताल पहुंची, जहां महिला की मां ने संबंधित कर्मचारी पर गुस्सा उतारते हुए चप्पलों और छाते से उसकी पिटाई कर दी।
घटना के दौरान अस्पताल परिसर में अफरा-तफरी मच गई और मरीजों व कर्मचारियों की भीड़ जमा हो गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक माहौल इतना तनावपूर्ण हो गया कि कई कर्मचारी घबराकर रोने लगे।
घटना के बाद अस्पताल प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। बताया गया कि मंगलवार को ही संबंधित कर्मचारी को विभाग से हटाकर प्राचार्य कार्यालय से संबद्ध करने के आदेश जारी किए गए थे, लेकिन बुधवार को वह फिर उसी विभाग में बैठा मिला। अब यह जांच का विषय बन गया है कि आदेशों के बावजूद कर्मचारी दोबारा वहां कैसे पहुंचा।
इसके अलावा अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था और सीसीटीवी सिस्टम पर भी सवाल उठे हैं। जिस बेसमेंट क्षेत्र में कथित घटना हुई वहां कैमरे नहीं लगे थे, जबकि कई कैमरे खराब बताए जा रहे हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि यदि वहां सीसीटीवी कैमरे होते तो पूरे विवाद की स्थिति स्पष्ट हो सकती थी। दोनों मामलों ने उत्तराखंड में चिकित्सा संस्थानों की पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
एक तरफ छात्रों का भविष्य संकट में है, तो दूसरी ओर अस्पतालों में मरीजों की सुरक्षा और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित विभाग और प्रशासन इन मामलों में क्या कार्रवाई करते हैं।

