न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचे थे हाईकोर्ट, मिला सिर्फ औपचारिक जवाब
देहरादून। उत्तराखंड में सामाजिक सरोकारों और जनहित के मुद्दों को लेकर आवाज उठाने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
लालकुआं-हल्दूचौड़ निवासी सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य एवं सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद बल्लभ भट्ट द्वारा उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेजी गई एक महत्वपूर्ण शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने का मामला अब चर्चा का विषय बन गया है।
यह शिकायत समाजसेवी एवं RTI कार्यकर्ता हेमंत गौनिया की सुरक्षा, खनन और शराब माफिया से कथित खतरे तथा प्रशासनिक निष्क्रियता से जुड़ी थी।
लेकिन RTI के माध्यम से सामने आया कि शिकायत को केवल “Filed” कर दिया गया और आगे कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इस खुलासे ने न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
समाजसेवा से जुड़ा नाम, संघर्षों से भरी पहचान
हेमंत गौनिया उत्तराखंड के उन समाजसेवियों में गिने जाते हैं जिन्होंने वर्षों से गरीब, असहाय और लावारिस लोगों के अंतिम संस्कार का जिम्मा उठाया है। जब कई बार परिवार तक अपने लोगों का अंतिम संस्कार करने से पीछे हट जाते हैं, तब हेमंत गौनिया जैसे लोग आगे आकर मानवता की मिसाल पेश करते हैं।
चित्रशिला घाट सहित कई क्षेत्रों में उनके सामाजिक कार्यों की चर्चा होती रही है। बताया जाता है कि वे रात-दिन जरूरतमंदों की मदद के लिए उपलब्ध रहते हैं और कई बार प्रशासनिक तंत्र से पहले घटनास्थल तक पहुंच जाते हैं।
उनकी पहचान सिर्फ एक समाजसेवी तक सीमित नहीं रही, बल्कि वे RTI कार्यकर्ता के रूप में भी विभिन्न मुद्दों को उठाते रहे हैं।
भ्रष्टाचार, अवैध खनन और स्थानीय स्तर पर हो रही अनियमितताओं के खिलाफ लगातार आवाज उठाने के कारण वे कई प्रभावशाली लोगों और कथित माफिया नेटवर्क के निशाने पर भी रहे हैं। यही कारण है कि उनकी सुरक्षा को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है।
शिकायत में क्या-क्या उठाए गए थे मुद्दे
गोविंद बल्लभ भट्ट द्वारा भेजी गई शिकायत में कहा गया था कि हेमंत गौनिया को लगातार धमकियां मिल रही हैं और उनके साथ किसी बड़ी घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
शिकायत में अवैध खनन और शराब कारोबार से जुड़े कथित माफिया तत्वों का जिक्र करते हुए कहा गया कि ऐसे लोग जनहित के मुद्दे उठाने वालों को चुप कराने की कोशिश कर रहे हैं।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया कि हेमंत गौनिया पर पहले भी हमले और दबाव बनाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। बावजूद इसके प्रशासन स्तर पर पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराई गई। शिकायतकर्ताओं ने न्यायालय से मांग की थी कि पूरे मामले की न्यायिक जांच कराई जाए और संबंधित समाजसेवी को सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।
कई जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने किया समर्थन
यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की शिकायत तक सीमित नहीं था। जानकारी के अनुसार इस शिकायत पर कई ग्राम प्रधानों, बीडीसी सदस्यों, जिला पंचायत प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों के हस्ताक्षर भी थे।
इससे साफ होता है कि स्थानीय स्तर पर इस मुद्दे को गंभीरता से देखा जा रहा था। ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना था कि यदि समय रहते सुरक्षा और जांच के कदम नहीं उठाए गए, तो कोई अप्रिय घटना हो सकती है।
उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां अवैध खनन और शराब तस्करी जैसे मुद्दे समय-समय पर विवादों में रहे हैं, वहां ऐसे मामलों में समाजसेवियों और RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही कारण है कि शिकायत को लेकर लोगों को उम्मीद थी कि न्यायालय स्तर से कोई ठोस निर्देश जारी होंगे।
RTI में सामने आया “Filed” का जवाब
पूरे मामले में सबसे अधिक चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत शिकायत की स्थिति के बारे में जानकारी मांगी गई। RTI के जवाब में बताया गया कि शिकायत को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, लेकिन उसे “Filed” कर दिया गया।
कानूनी भाषा में “Filed” का अर्थ सामान्य तौर पर दस्तावेज को रिकॉर्ड में रखना होता है। लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इसके बाद न कोई जांच शुरू हुई, न किसी एजेंसी को निर्देश दिए गए और न ही सुरक्षा संबंधी कोई आदेश जारी हुआ। यही कारण है कि अब इस जवाब को लेकर असंतोष और सवाल दोनों बढ़ते जा रहे हैं।
सूचना के अधिकार पर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि RTI के तहत मांगी गई जानकारी भी समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके बाद प्रथम अपील दायर की गई, लेकिन वहां भी केवल औपचारिक जवाब देकर मामला समाप्त कर दिया गया। अब दोबारा शिकायत और सूचना आवेदन भेजे जाने की बात कही जा रही है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि RTI कानून को पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक मजबूत माध्यम माना जाता है। यदि न्यायिक संस्थाओं में भी सूचना देने में देरी या औपचारिकता दिखाई जाए, तो इससे आम लोगों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
न्यायिक व्यवस्था पर उठते सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि किसी समाजसेवी और RTI कार्यकर्ता की सुरक्षा से जुड़ी शिकायत पर भी कोई स्पष्ट कार्रवाई नहीं होती, तो आम नागरिकों की शिकायतों का क्या होगा।
सामाजिक संगठनों का कहना है कि जब लोग न्याय की उम्मीद लेकर उच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्था तक पहुंचते हैं, तब उन्हें कम से कम शिकायत पर कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए।
कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि शिकायत को “फाइल” कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब मामला किसी व्यक्ति की सुरक्षा और संभावित खतरे से जुड़ा हो।
उनका कहना है कि ऐसे मामलों में संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से रिपोर्ट मांगना, सुरक्षा का आकलन करना और आवश्यक निर्देश देना अपेक्षित प्रक्रिया होनी चाहिए।
उत्तराखंड में RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा बड़ा मुद्दा
उत्तराखंड में बीते वर्षों में कई RTI कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता विवादों और हमलों का सामना कर चुके हैं।
अवैध खनन, भूमि घोटाले, शराब तस्करी और सरकारी भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को उजागर करने वालों को अक्सर धमकियों का सामना करना पड़ता है। कई बार ऐसे मामलों में सुरक्षा की मांग उठी, लेकिन प्रभावी तंत्र विकसित नहीं हो पाया।
विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य सरकार और प्रशासन को RTI कार्यकर्ताओं की सुरक्षा के लिए अलग नीति बनानी चाहिए।
क्योंकि सूचना के अधिकार के जरिए भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को सामने लाने वाले लोग लोकतंत्र को मजबूत करने का कार्य करते हैं। यदि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तो जनहित से जुड़े मुद्दों को उठाने वाले लोग हतोत्साहित होंगे।
समाजसेवियों ने की न्यायिक जांच की मांग
मामले के सामने आने के बाद विभिन्न सामाजिक संगठनों और स्थानीय लोगों ने इसकी उच्च स्तरीय न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि शिकायत पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं हुई। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि सुरक्षा संबंधी मामलों में न्यायालय प्रशासन की प्रक्रिया क्या होती है।
समाजसेवियों का कहना है कि यदि किसी शिकायत पर कार्रवाई संभव नहीं थी, तो शिकायतकर्ता को कारणों सहित विस्तृत जवाब दिया जाना चाहिए था। केवल “Filed” लिखकर मामले को बंद करना कई सवाल खड़े करता है।
लोकतंत्र में आवाज उठाने वालों की सुरक्षा जरूरी
लोकतंत्र में समाजसेवी, पत्रकार, RTI कार्यकर्ता और जनहित के मुद्दे उठाने वाले लोग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये लोग उन समस्याओं को सामने लाते हैं जिन पर कई बार प्रशासन या व्यवस्था ध्यान नहीं देती।
ऐसे में यदि इन्हीं लोगों को सुरक्षा का संकट महसूस होने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाता है।
हेमंत गौनिया से जुड़ा यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उन तमाम लोगों की सुरक्षा और अधिकारों से जोड़कर देखा जा रहा है जो समाजहित में काम करते हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दोबारा भेजी गई शिकायत पर क्या कदम उठाए जाते हैं और क्या संबंधित एजेंसियां इस मामले को गंभीरता से लेकर कोई कार्रवाई करती हैं।

