बिग ब्रेकिंग: वैवाहिक विवादों में AI से गढ़े जा रहे फर्जी सबूत गंभीर चिंता का विषय: सुप्रीम कोर्ट

वैवाहिक विवादों में AI से गढ़े जा रहे फर्जी सबूत गंभीर चिंता का विषय: सुप्रीम कोर्ट

  • झूठे आरोप, पुलिस शिकायत और गिरफ्तारी से रिश्तों में ‘नो रिटर्न’ की स्थिति बनती है– अदालत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में फर्जी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से तैयार किए जा रहे साक्ष्यों के बढ़ते चलन पर गहरी चिंता जताई है।

अदालत ने कहा कि आज पति-पत्नी के बीच मतभेद होते ही एक-दूसरे को “किसी भी कीमत पर सबक सिखाने” की मानसिकता हावी हो जाती है, जिसके चलते झूठे आरोप लगाए जाते हैं और अब तकनीक के दौर में सबूत तक गढ़े जा रहे हैं।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की खंडपीठ ने विवाह को अप्रतिरोहणीय विघटन (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर भंग करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने कहा, “वैवाहिक विवाद पैदा होते ही यह सोच शुरू हो जाती है कि दूसरे पक्ष को कैसे सबक सिखाया जाए। इसके लिए सबूत जुटाए जाते हैं और कई मामलों में आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के दौर में सबूत बनाए भी जाते हैं। झूठे आरोप आम होते जा रहे हैं।”

पहले मध्यस्थता, मुकदमेबाजी आखिरी विकल्प

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद उत्पन्न होने पर सबसे पहले पक्षकारों और उनके वकीलों का दायित्व है कि वे मुकदमेबाजी से पहले मध्यस्थता (Pre-Litigation Mediation) की दिशा में गंभीर प्रयास करें। कुछ मामलों में काउंसलिंग भी आवश्यक हो सकती है।

अदालत ने कहा कि भले ही मामले भरण-पोषण (BNSS, 2023 की धारा 144 / पूर्व धारा 125 CrPC) या घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 से जुड़े हों, फिर भी अदालतों को सबसे पहले सुलह-समझौते की संभावना तलाशनी चाहिए, न कि तुरंत जवाब-प्रतिजवाब और आरोप-प्रत्यारोप की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।

पुलिस शिकायत और गिरफ्तारी पर सख्त टिप्पणी

अदालत ने साधारण वैवाहिक विवादों में सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की प्रवृत्ति पर भी कड़ा रुख अपनाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में प्राथमिकता सुलह-समझौते की होनी चाहिए, वह भी संभव हो तो अदालतों के मध्यस्थता केंद्रों के माध्यम से।

कोर्ट ने आगाह किया कि गिरफ्तारी even अगर एक दिन के लिए हो अक्सर “नो रिटर्न” की स्थिति पैदा कर देती है, जिससे रिश्तों में सुधार की संभावना पूरी तरह खत्म हो जाती है।

13 साल से टूट चुका था विवाह

जस्टिस राजेश बिंदल द्वारा लिखित फैसले में कहा गया कि यह विवाह पिछले 13 वर्षों से पूरी तरह टूट चुका था। वर्ष 2012 में शादी के बाद पति-पत्नी केवल 65 दिन साथ रहे, लेकिन इसके बाद एक दशक से अधिक समय तक कानूनी लड़ाइयों में उलझे रहे।

दोनों पक्षों के बीच 40 से अधिक मुकदमे चले, जिनमें तलाक याचिकाएं, भरण-पोषण के मामले, घरेलू हिंसा के प्रकरण, आईपीसी की धारा 498A के तहत आपराधिक केस, निष्पादन याचिकाएं, झूठी गवाही से जुड़े आवेदन, रिट याचिकाएं और विभिन्न अदालतों में स्थानांतरण अर्जियां शामिल थीं।

मामला सुप्रीम कोर्ट में पत्नी द्वारा पति के खिलाफ दर्ज मामलों के स्थानांतरण की मांग के साथ पहुंचा था। मध्यस्थता का प्रयास भी किया गया, लेकिन वह सफल नहीं हो सका। इसके बाद पत्नी ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विवाह विच्छेद की मांग की, जिसे स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विवाह को भंग कर दिया।