बिग ब्रेकिंग: सिर्फ FIR दर्ज होना आपराधिक मामला लंबित होने का प्रमाण नहीं: हाईकोर्ट

सिर्फ FIR दर्ज होना आपराधिक मामला लंबित होने का प्रमाण नहीं: हाईकोर्ट

नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी चुनाव उम्मीदवार के खिलाफ केवल एफआईआर दर्ज होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि उसके विरुद्ध कोई आपराधिक मामला लंबित है।

अदालत ने कहा कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33ए के तहत किसी उम्मीदवार पर अपने आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा करने की वैधानिक बाध्यता तभी बनती है, जब संबंधित मामले में अदालत द्वारा आरोप तय कर दिए गए हों या अपराध का संज्ञान लिया गया हो।

जस्टिस जसमीत सिंह ने यह टिप्पणी आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता मनीष सिसोदिया की 2020 विधानसभा चुनाव में पटपड़गंज सीट से जीत को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए की। यह याचिका उनके प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार प्रताप चंद्र द्वारा दायर की गई थी।

क्या थे आरोप

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि मनीष सिसोदिया ने मतदान से पहले के प्रतिबंधित 48 घंटों के दौरान चुनाव प्रचार जारी रखा।

इसके साथ ही आरोप लगाया गया कि सिसोदिया ने वर्ष 2013 में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एक एफआईआर की जानकारी चुनावी हलफनामे में छिपाई, जो तथ्यों को दबाने के समान है।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने इन दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केवल एफआईआर दर्ज होने को जानबूझकर छिपाया गया तथ्य नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब उस मामले में न तो आरोप तय हुए हों और न ही अदालत ने संज्ञान लिया हो।

जस्टिस सिंह ने कहा कि आपराधिक इतिहास के खुलासे का उद्देश्य मतदाताओं को सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाना है, लेकिन यह खुलासा कानून में निर्धारित सीमाओं और शर्तों के अनुसार ही किया जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहा कि मनीष सिसोदिया को उस पुरानी एफआईआर की जानकारी थी।

याचिका में गंभीर खामियां

हाईकोर्ट ने याचिका में लगाए गए आरोपों को सामान्य और अस्पष्ट बताया। अदालत ने कहा कि चुनाव याचिका में यह स्पष्ट करना अनिवार्य होता है कि कथित उल्लंघन ने चुनाव परिणाम को किस प्रकार प्रभावित किया, लेकिन याचिकाकर्ता इस संबंध में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सका।

इसके अलावा, अदालत ने याचिका की तकनीकी कमियों पर भी कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता ने न तो निर्धारित प्रारूप में हलफनामा दाखिल किया और न ही अपने आरोपों के स्रोतों का खुलासा किया।

अदालत ने कहा कि ये कमियां केवल तकनीकी नहीं हैं, बल्कि याचिका की विश्वसनीयता को ही समाप्त कर देती हैं।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सामान्य आरोपों या प्रशासनिक निष्क्रियता के आधार पर किसी निर्वाचित प्रतिनिधि के निर्वाचन को अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
इस फैसले के साथ ही मनीष सिसोदिया के निर्वाचन को दी गई चुनौती पूरी तरह समाप्त हो गई।