विशेष रिपोर्ट: डिजिटल व्यवस्था और ज़मीनी हकीकत के बीच फंसे लाभार्थी

डिजिटल व्यवस्था और ज़मीनी हकीकत के बीच फंसे लाभार्थी

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी राशन व्यवस्था को पारदर्शी और फर्जीवाड़े से मुक्त करने के उद्देश्य से शुरू की गई राशन कार्ड ई-केवाईसी प्रक्रिया अब एक नई चुनौती बनकर सामने आ रही है।

सरकार का दावा है कि इस डिजिटल पहल से पात्र लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ सीधे पहुंचेगा, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि लंबा समय बीत जाने के बावजूद प्रदेश में अब तक केवल लगभग 80 प्रतिशत राशन कार्डों की ही ई-केवाईसी पूरी हो पाई है। शेष 20 प्रतिशत लाभार्थी आज भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं।

डिजिटल सुधार की मंशा

भारत सरकार के निर्देशों के तहत वर्ष 2025 में उत्तराखंड में राशन कार्डों को पूरी तरह डिजिटल करने के लिए ई-केवाईसी अभियान शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य था कि अंत्योदय और प्रायोरिटी हाउसहोल्ड (PHH) श्रेणी के वास्तविक और पात्र लोगों को ही सरकारी राशन का लाभ मिले।

बायोमेट्रिक और रेटिना स्कैन के ज़रिये लाभार्थी की पहचान सुनिश्चित कर डुप्लीकेसी, फर्जी कार्ड और भ्रष्टाचार पर रोक लगाना इस योजना का मुख्य लक्ष्य था।
हालांकि, योजना की मंशा जितनी स्पष्ट थी, उसका क्रियान्वयन उतना ही जटिल साबित हुआ।

समय सीमा बढ़ी, फिर भी लक्ष्य अधूरा

ई-केवाईसी प्रक्रिया के दौरान लगातार सामने आ रही समस्याओं और नकारात्मक फीडबैक के चलते राज्य सरकार को दो बार इसकी समय सीमा बढ़ानी पड़ी।

अंतिम रूप से इसकी डेडलाइन 31 दिसंबर 2025 तय की गई थी। लेकिन वर्ष 2026 का जनवरी महीना भी आधा बीत जाने के बावजूद प्रदेश के कई हिस्सों में यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है।

खाद्य आपूर्ति विभाग के अधिकारियों के अनुसार, दूरस्थ और पहाड़ी क्षेत्रों में नेटवर्क की कमी, संसाधनों का अभाव और तकनीकी दिक्कतें इस देरी की सबसे बड़ी वजह रही हैं।

मंत्री की नाराज़गी और सरकार का पक्ष

खाद्य आपूर्ति मंत्री रेखा आर्या ने इस स्थिति पर नाराज़गी जाहिर करते हुए कहा है कि ई-केवाईसी का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचे।

उनका कहना है कि यह अभियान राशन वितरण प्रणाली में वर्षों से चली आ रही धांधली और फर्जीवाड़े को रोकने के लिए बेहद आवश्यक है।

मंत्री के अनुसार, सरकार की ओर से लगातार जन-जागरूकता अभियान चलाए गए और लाभार्थियों की मांग पर समय सीमा भी बढ़ाई गई। इसके बावजूद अंतिम तारीख तक केवल 80 प्रतिशत उपलब्धि ही हासिल हो सकी।

क्या वाकई कोई राशन से वंचित नहीं होगा?

सरकार ने बार-बार यह स्पष्ट किया है कि किसी भी पात्र व्यक्ति को राशन से वंचित नहीं किया जाएगा। मंत्री रेखा आर्या के मुताबिक, गंभीर बीमारी, दिव्यांगता या बायोमेट्रिक और रेटिना स्कैन में तकनीकी समस्या वाले लोगों को पहले ही छूट दी गई है।

साथ ही, जो लोग अब भी ई-केवाईसी नहीं करा पाए हैं, उनके मामलों की जांच की जाएगी। यदि इसके बावजूद कोई पात्र व्यक्ति छूट जाता है, तो राज्य सरकार इस विषय में केंद्र सरकार से अनुरोध करेगी।

ज़मीनी सच्चाई: पहाड़ और नेटवर्क की चुनौती

हालांकि सरकारी आश्वासन अपनी जगह है, लेकिन उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी गांवों में रहने वाले लोगों के लिए ई-केवाईसी आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कई इलाकों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट कनेक्टिविटी का अभाव, बुजुर्गों की तकनीकी असमर्थता और सीमित सरकारी संसाधन इस प्रक्रिया को कठिन बना रहे हैं।

यह सवाल भी उठता है कि क्या डिजिटल सुधारों को लागू करते समय ज़मीनी परिस्थितियों को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखा गया?

नीति और संवेदनशीलता के बीच संतुलन जरूरी

राशन कार्ड ई-केवाईसी जैसी योजनाएं निश्चित रूप से पारदर्शिता और सुशासन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं। लेकिन जब ऐसी योजनाएं सीधे गरीब, बुजुर्ग और ग्रामीण आबादी से जुड़ी हों, तो उनके क्रियान्वयन में संवेदनशीलता और लचीलापन उतना ही आवश्यक हो जाता है।

उत्तराखंड के मामले में ई-केवाईसी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि डिजिटल इंडिया की राह पर आगे बढ़ते हुए नीति और ज़मीनी हकीकत के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। अगर यह संतुलन नहीं बना, तो सुधार की मंशा कहीं न कहीं आम जनता के लिए नई मुश्किल बन सकती है।