चोर की दाढ़ी में तिनका, सूचना का अधिकार अधिनियम संसोधन-2019

– चोर की दाढ़ी में तिनका, सूचना का अधिकार अधिनियम संसोधन-2019……..

– सूचना-अब क्या पूछना? आरटीआई एक्टिविस्ट संजय भट्ट…..

देहरादून। आरटीआई- 2004 से 2009 और फिर 2013 तक केंद्र की UPA सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने देश में लंबे समय से चली आ रही मांग को मानते हुए, सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 आरटीआई को 12 मई 2005 को संसद में पारित किया और फिर 15 जून 2005 को इस कानून पर राष्ट्रपति ने भी अपनी मोहर लगा दी। जिसके बाद 12 अक्टूबर 2005 से यह कानून जम्मू कश्मीर को छोड़ पूरे देश में लागू हो गया। अब सूबे की केंद्र की NDA सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के पुरजोर विरोध के बाद भी सूचना का अधिकार (संशोधन) बिल गुरुवार (25 जुलाई) को संसद से पारित करवा दिया।

 

पारदर्शिता- सूचना का अधिकार, अधिनियम-2005 RTI सरकारों के कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए लाया गया।जिससे कि, भारत का नागरिक अपनी सरकार, मंत्रियों, नोकरशाहों के द्वारा किये गए कार्यों को जान सकें, और सरकार शासन प्रशासन में हो रही अनियमिताओं व भ्रष्टाचार पर नकेल कस सके व जनता को अपने टेक्स के पैसों से हो रहे कामों की सम्पूर्ण जानकारी मिल सके।

– स्वतंत्र सूचना का अधिकार vs परतंत्र आरटीआई

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सूचना आयोग एक स्वतंत्र इकाई से सरकार की एजेंसी तक- सूचना का अधिकार संसोधन अधिनियम-2019 से पूर्व तक केंद्र में मुख्य सूचना आयुक्त की तरह राज्य में भी मुख्य सूचना आयुक्त होते हैं। केंद्र के मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अगुआई में तीन सदस्यीय पैनल करता है। इसमें प्रधानमंत्री के साथ लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नॉमिनेटेड कोई कैबिनेट मंत्री होता है।

 

ऐसे ही राज्यों में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री की अगुआई में तीन सदस्यीय पैनल होता है। इसमें मुख्यमंत्री के साथ विधानसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का नेता और मुख्यमंत्री द्वारा नॉमिनेटेड कैबिनेट मंत्री होता है। लेकिन अब नियुक्ति के सारे अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिए हैं। नियुक्ति और सेवा शर्तों का निर्धारण अब केंद्र सरकार खुद करेगी।

 

सिर्फ इतना ही नहीं सूचना आयुक्तों को हटाने का अधिकार जो देश में राष्ट्रीय व राज्यों में राज्यपाल के पास था। वो भी तब जब सुप्रीम कोर्ट उनपर भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए। परन्तु अब सूचना आयुक्तों को हटाने का काम भी केंद्र सरकार ही करेगी। साथ ही उनके वेतन निर्धारण भी अब केंद्र सरकार ही करेगी। जिससे सूचना आयुक्त भी अब केंद्र सरकार की कठपुतली के रूप में काम करेगा। केंद्र सरकार की पोल खोली तो नोकरी गयी समझो।