बिग ब्रेकिंग: हाईकोर्ट के दो अहम फैसले। प्रमुख सचिव वन को अवमानना नोटिस, भरण-पोषण मामले में पति की याचिका खारिज

हाईकोर्ट के दो अहम फैसले। प्रमुख सचिव वन को अवमानना नोटिस, भरण-पोषण मामले में पति की याचिका खारिज

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बुधवार को दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण आदेश पारित किए। एक ओर आईएफएस अधिकारी पंकज कुमार की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण आर.के. सुधांशु को अवमानना नोटिस जारी कर तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए। वहीं, अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाले एक सेना के जवान की याचिका को भी खारिज कर दिया।

आईएफएस अधिकारी पंकज कुमार की अवमानना याचिका पर न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने सुनवाई की। याचिकाकर्ता का आरोप है कि नैनीताल हाईकोर्ट की खंडपीठ ने 4 सितंबर 2025 को उनके संबंध में अंतरिम आदेश जारी करते हुए किसी भी प्रकार की कार्रवाई से परहेज करने के निर्देश दिए थे।

इसके बावजूद राज्य सरकार ने 13 अप्रैल 2026 को उनका स्थानांतरण और नई तैनाती का आदेश जारी कर दिया।

याचिका में कहा गया है कि यह कदम हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना है। साथ ही शासन को दिए गए प्रतिनिधित्व (रिमाइंडर) पर भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।

याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि स्थानांतरण प्रक्रिया में भारतीय वन सेवा (कैडर) नियमों तथा सिविल सर्विसेज बोर्ड की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। मामले को गंभीर मानते हुए कोर्ट ने प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण रमेश कुमार सुधांशु से जवाब तलब किया है।

उधर, न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को चुनौती देने वाले एक सेना के जवान की याचिका को खारिज कर दिया।

हल्द्वानी निवासी जवान ने परिवार न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें अलग रह रही पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में प्रति माह 10 हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया था।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि वह उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में तैनात है और उसका मासिक वेतन 92 हजार रुपये है। हालांकि, प्रोविडेंट फंड, बीमा और ऋण की किस्तों जैसी कटौतियों के बाद उसके पास सीमित आय बचती है।

उसने यह भी कहा कि हाई-रिस्क पोस्टिंग समाप्त होने पर उसका वेतन घटकर लगभग 72 हजार रुपये रह जाएगा और उसे अपनी मां व भाई की आर्थिक जिम्मेदारी भी उठानी पड़ती है।

इन दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि पत्नी को गरिमा के साथ जीवन जीने और पति की आर्थिक क्षमता के अनुरूप जीवन स्तर प्राप्त करने का अधिकार है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पत्नी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी पति का कानूनी दायित्व है और उसकी आय को देखते हुए 10 हजार रुपये प्रतिमाह की अंतरिम भरण-पोषण राशि न तो अत्यधिक है और न ही मनमानी। इसलिए परिवार न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।