3 हजार पेड़ों पर चलेगी आरी, 25 साल में 46 हजार हेक्टेयर वन भूमि हस्तांतरित
- 743 करोड़ की हाईवे परियोजना से सफर होगा आसान, लेकिन पेड़ों की कटाई और जंगलों के लगातार घटते दायरे पर उठे सवाल; सामाजिक संगठनों ने जताई चिंता
देहरादून। उत्तराखंड में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एक ओर भानियावाला से ऋषिकेश तक 20 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग को फोर और सिक्स लेन बनाने के लिए करीब 3,000 पेड़ों की कटाई की तैयारी चल रही है।
वहीं दूसरी ओर आरटीआई से सामने आए आंकड़ों ने खुलासा किया है कि राज्य गठन के बाद पिछले 25 वर्षों में 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की जा चुकी है। इन दोनों मामलों ने विकास की दिशा और पर्यावरणीय संतुलन को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग का चौड़ीकरण करीब 743 करोड़ रुपये की लागत से हाइब्रिड एन्युटी मॉडल के तहत कर रहा है।
परियोजना पूरी होने पर देहरादून, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट, ऋषिकेश और चारधाम यात्रा मार्ग की कनेक्टिविटी बेहतर होगी, यात्रा का समय कम होगा और जाम की समस्या में भी राहत मिलने की उम्मीद है।
एनएचएआई का दावा है कि पर्यावरणीय नुकसान कम करने के लिए वन क्षेत्र में सामान्य 60 मीटर के बजाय लगभग 23 मीटर राइट ऑफ वे रखा गया है। साथ ही 754 पेड़ों का प्रतिरोपण (ट्रांसप्लांटेशन) किया जाएगा।
परियोजना में हाथियों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 3.5 किलोमीटर लंबी एलिवेटेड रोड, एलीफेंट अंडरपास, साउंड बैरियर, एंटी-ग्लेयर स्क्रीन और नो हॉर्न जोन जैसी व्यवस्थाएं भी शामिल की गई हैं।
वन विभाग के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में इस मार्ग पर सड़क दुर्घटनाओं में 29 वन्यजीवों की मौत हुई है, जिसे कम करने के लिए ये उपाय किए जा रहे हैं।
हालांकि स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यह क्षेत्र एलीफेंट कॉरिडोर का हिस्सा है और हजारों पेड़ों की कटाई से पर्यावरण, जैव विविधता और मानव-वन्यजीव संघर्ष पर गंभीर असर पड़ सकता है।
उनका आरोप है कि विकास के नाम पर जंगलों का लगातार नुकसान हो रहा है और इस परियोजना पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
इसी बीच वन संरक्षण निदेशालय से सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त आंकड़ों ने भी चिंता बढ़ा दी है। राज्य गठन से जून 2026 तक 46,203.76 हेक्टेयर वन भूमि विभिन्न परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई है।
इनमें सबसे अधिक 22,250.08 हेक्टेयर भूमि जलविद्युत परियोजनाओं, 10,070.03 हेक्टेयर सड़क निर्माण, 9,289.81 हेक्टेयर खनन, 3,005.51 हेक्टेयर पारेषण लाइनों तथा शेष भूमि अन्य विकास कार्यों के लिए दी गई।
जिलेवार आंकड़ों में देहरादून सबसे आगे है, जहां अकेले 21,618.32 हेक्टेयर वन भूमि विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित की गई, जो कुल हस्तांतरित वन भूमि का लगभग 47 प्रतिशत है। इसके बाद हरिद्वार, नैनीताल, चमोली, टिहरी और पिथौरागढ़ का स्थान है।
समाजसेवी अनूप नौटियाल का कहना है कि पिछले 25 वर्षों में औसतन हर दिन करीब 5 हेक्टेयर यानी लगभग 250 नाली जंगल विकास परियोजनाओं की भेंट चढ़ा है।
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु अरोड़ा ने कहा कि एलीफेंट कॉरिडोर और वृक्ष कटान से जुड़े मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं, इसलिए पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में विकास परियोजनाओं पर गंभीरता से पुनर्विचार होना चाहिए।
फिलहाल सरकार और एनएचएआई इस परियोजना को विकास, बेहतर यातायात और सुरक्षित सफर के लिए जरूरी बता रहे हैं, जबकि पर्यावरणविद और सामाजिक संगठन इसे उत्तराखंड के जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव का प्रतीक मान रहे हैं।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का कोई स्थायी मॉडल तैयार किया जा सकेगा?

