देहरादून में 1896 अस्पताल संचालित, सिर्फ 143 के पास फायर एनओसी। 68 को नोटिस
राजधानी देहरादून में अस्पतालों की फायर सेफ्टी व्यवस्था बेहद चिंताजनक स्थिति में पहुंच चुकी है। जिन अस्पतालों में लोग अपनी और अपने परिजनों की जिंदगी बचाने की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहीं अस्पताल अब खुद बड़े हादसों का कारण बनते दिखाई दे रहे हैं।
शहर के अधिकांश अस्पताल बिना फायर एनओसी और अधूरी सुरक्षा व्यवस्थाओं के सहारे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर मरीजों की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
हाल ही में राजधानी के पैनेसिया अस्पताल में लगी आग ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र की लापरवाही को उजागर कर दिया। इस दर्दनाक हादसे में एक मरीज की मौत हो गई, जबकि कई मरीज झुलस गए।
आग लगने के बाद अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई और आनन-फानन में मरीजों को दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करना पड़ा। यह घटना केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शहर की अस्पताल व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करती है।
दरअसल, पूरे प्रदेश से गंभीर मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद में देहरादून पहुंचते हैं। राजधानी में बड़े निजी अस्पतालों से लेकर छोटे क्लीनिक और नर्सिंग होम तक बड़ी संख्या में संचालित हो रहे हैं। लेकिन इन संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था कितनी मजबूत है, यह आंकड़े खुद बयां कर रहे हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देहरादून में कुल 1896 अस्पताल, क्लीनिक, नर्सिंग होम और पैथोलॉजी सेंटर संचालित हो रहे हैं, लेकिन इनमें से केवल 143 संस्थानों के पास ही फायर विभाग की एनओसी है।
यानी हजारों मरीज रोज ऐसे अस्पतालों में इलाज कराने पहुंच रहे हैं जहां आग जैसी आपात स्थिति से निपटने के पर्याप्त इंतजाम तक मौजूद नहीं हैं।
स्थिति और भी भयावह इसलिए हो जाती है क्योंकि कई अस्पतालों में लगे फायर उपकरण या तो खराब पड़े हैं या केवल दिखावे के लिए लगाए गए हैं। कहीं फायर अलार्म सिस्टम काम नहीं कर रहा तो कहीं इमरजेंसी एग्जिट बंद पड़े हैं।
कई अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर और ज्वलनशील उपकरण बेहद असुरक्षित तरीके से रखे गए हैं। ऐसे में यदि किसी अस्पताल में आग लगती है तो मरीजों, तीमारदारों और स्टाफ के लिए बाहर निकलना बेहद मुश्किल हो सकता है।
फायर विभाग के आंकड़े भी अस्पतालों की लापरवाही की पुष्टि कर रहे हैं। उपनिदेशक फायर ब्रिगेड संदीप राणा के मुताबिक जनवरी 2025 से 21 मई 2026 तक देहरादून में सुरक्षा मानकों में कमी मिलने पर 14 अस्पतालों को नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
वहीं पूरे उत्तराखंड में 68 अस्पतालों को नोटिस दिए गए हैं। ये आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि अस्पताल प्रबंधन अग्नि सुरक्षा नियमों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।
प्रदेशभर में केवल 583 अस्पतालों को ही फायर एनओसी जारी की गई है, जिनमें देहरादून के 143 अस्पताल शामिल हैं। जबकि वास्तविक संख्या इससे कई गुना ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि बड़ी संख्या में अस्पताल बिना पूर्ण सुरक्षा मानकों के संचालन कर रहे हैं।
सवाल यह भी उठता है कि आखिर बिना एनओसी के अस्पतालों को संचालन की अनुमति कैसे मिल रही है? क्या संबंधित विभाग समय-समय पर निरीक्षण नहीं कर रहे या फिर नियम केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि अस्पतालों में फायर सेफ्टी अन्य भवनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि यहां गंभीर मरीज, बुजुर्ग, नवजात और आईसीयू में भर्ती लोग मौजूद रहते हैं। ऐसे मरीज आपात स्थिति में खुद बाहर नहीं निकल सकते।
यदि अस्पताल में पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था न हो तो छोटी सी चूक भी बड़े हादसे में बदल सकती है। यही कारण है कि अस्पतालों में फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम, इमरजेंसी एग्जिट, धुआं निकालने की व्यवस्था और प्रशिक्षित स्टाफ होना बेहद जरूरी माना जाता है।
पैनेसिया अस्पताल हादसे के बाद लोगों में डर का माहौल है। मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि वे इलाज कराने अस्पताल जाते हैं, लेकिन अब वहां भी सुरक्षा की गारंटी नहीं बची है। लोगों का सवाल है कि यदि अस्पताल ही सुरक्षित नहीं हैं तो आम आदमी आखिर भरोसा किस पर करे?
फायर विभाग लगातार अस्पतालों को नोटिस जारी कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद हालात में बड़ा सुधार दिखाई नहीं दे रहा। कई अस्पताल केवल निरीक्षण के समय अस्थायी इंतजाम कर लेते हैं, जबकि स्थायी सुरक्षा व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जाता। यही लापरवाही भविष्य में और बड़े हादसों को जन्म दे सकती है।
जरूरत इस बात की है कि सरकार और प्रशासन इस मुद्दे को गंभीरता से लें। बिना फायर एनओसी वाले अस्पतालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। नियमित निरीक्षण, सुरक्षा ऑडिट और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
साथ ही अस्पताल स्टाफ को समय-समय पर फायर सेफ्टी ट्रेनिंग भी दी जानी चाहिए ताकि आपात स्थिति में मरीजों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके। देहरादून जैसे बड़े मेडिकल हब में यदि अस्पतालों की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कमजोर है तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो आने वाले दिनों में और भी बड़े हादसे सामने आ सकते हैं। मरीजों की जिंदगी के साथ किसी भी तरह की लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

