बिग ब्रेकिंग: सुप्रीम कोर्ट में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुनवाई। आप भी पढ़ें….

सुप्रीम कोर्ट में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुनवाई। आप भी पढ़ें….

नई दिल्ली। Supreme Court of India में इन दिनों कई अहम मामलों की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणियां और फैसले सामने आए हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया, संवैधानिक मूल्यों और जांच एजेंसियों की शक्तियों से जुड़े व्यापक सवालों को रेखांकित करते हैं।

सबरीमला मामले की सुनवाई के आठवें दिन जस्टिस बी. वी. नागरत्ना की एक हल्की-फुल्की लेकिन अर्थपूर्ण टिप्पणी चर्चा में रही, जब उन्होंने “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” से मिली जानकारी को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि अदालत केवल विश्वसनीय और प्रमाणिक स्रोतों पर ही भरोसा कर सकती है।

इस दौरान चीफ जस्टिस Surya Kant ने भी स्पष्ट किया कि किसी लेख या व्यक्तिगत विचार का सम्मान किया जा सकता है, लेकिन वह अदालत पर बाध्यकारी नहीं होता। सुनवाई के दौरान अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संतुलन, धार्मिक स्वतंत्रता और ‘संवैधानिक नैतिकता’ बनाम ‘सार्वजनिक नैतिकता’ जैसे मुद्दों पर भी विस्तृत बहस हुई।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे के लिए एक बड़ी पहल करते हुए 45,098 मामलों की पहचान की है, जिन्हें मध्यस्थता और लोक अदालत के माध्यम से सुलझाया जाएगा।

समाधान समारोह’ नाम से शुरू की गई यह पहल 21 से 23 अगस्त 2026 तक आयोजित होगी, जिसका उद्देश्य “डोरस्टेप डिलीवरी ऑफ जस्टिस” को बढ़ावा देना है।

Supreme Court Bar Association द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, वकीलों से इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी की अपील की गई है और मामलों की पहचान के लिए डिजिटल माध्यम भी उपलब्ध कराया जाएगा।

वहीं, National Investigation Agency की शक्तियों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि बिना स्पष्ट कानूनी प्रावधान के NIA किस आधार पर स्वतः FIR दर्ज कर सकती है और क्या उसे “पुलिस स्टेशन” का दर्जा प्राप्त है।

यह मामला केरल के एक हत्या प्रकरण से जुड़ा है, जहां राज्य पुलिस द्वारा जांच पूरी किए जाने के बावजूद NIA ने मामला अपने हाथ में ले लिया। अदालत ने इस पर स्पष्टता के लिए केंद्र से अतिरिक्त दस्तावेज पेश करने को कहा है।

इसके अलावा, Enforcement Directorate और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच विवाद की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यदि किसी केंद्रीय एजेंसी की जांच में मुख्यमंत्री हस्तक्षेप करते हैं, तो उसे केंद्र और राज्य के बीच का संघीय विवाद नहीं माना जा सकता, बल्कि यह एक व्यक्ति के आचरण से जुड़ा मामला है।

यह टिप्पणी Mamata Banerjee से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें ईडी ने जांच में बाधा डालने का आरोप लगाया है।

सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि यदि डीएनए परीक्षण से यह साबित हो जाता है कि कोई व्यक्ति बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो उसे भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, भले ही बच्चा वैवाहिक संबंध के दौरान जन्मा हो।

अदालत ने हालांकि बच्चे के हितों को ध्यान में रखते हुए संबंधित सरकारी विभाग को उसकी शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं।

इसके साथ ही अदालत ने उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक उपयोग की जमीन को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उप-विभागीय अधिकारी (SDO) के पास ऐसी जमीन का वर्गीकरण बदलकर उसे निजी अधिकारों के लिए आवंटित करने का कोई अधिकार नहीं है।

अदालत ने कहा कि चारागाह और खलिहान जैसी जमीनें सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित हैं और इन पर दिए गए पट्टे “शुरू से ही शून्य” माने जाएंगे। इस फैसले के साथ कोर्ट ने प्रशासनिक अधिकारियों की सीमाओं को भी स्पष्ट कर दिया है।

कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों और फैसलों से यह संकेत मिलता है कि अदालत न्यायिक अनुशासन, संवैधानिक मूल्यों और संस्थागत जवाबदेही को लेकर सख्त रुख अपनाए हुए है, चाहे मामला धार्मिक आस्था का हो, जांच एजेंसियों की शक्तियों का या नागरिक अधिकारों का।