पहाड़ों में ‘जंगल का खौफ’, मैदानों में ‘अपराध का डर’। दोहरी असुरक्षा के घेरे में उत्तराखंड की महिलाएं
देहरादून। उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर तस्वीर दो हिस्सों में बंटी नजर आती है। मैदानी जिलों में जहां महिलाएं अपराधियों के निशाने पर हैं, वहीं पर्वतीय इलाकों में उनका सबसे बड़ा खतरा जंगलों से निकलकर गांवों तक पहुंच रहे वन्यजीव बन गए हैं।
आंकड़े बताते हैं कि अपराध के मामलों में कमी आई है, लेकिन पहाड़ों में महिलाओं के लिए असुरक्षा की भावना आज भी रोजमर्रा की सच्चाई बनी हुई है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 2024 में उत्तराखंड में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में करीब 12 प्रतिशत की कमी आई है। वर्ष 2022 में 4,337 मामले दर्ज हुए थे, जो 2023 में घटकर 3,808 और 2024 में 3,342 रह गए।
हालांकि 2024 में ही 56 महिलाओं की हत्या के मामले सामने आए। आंकड़ों में गिरावट के बावजूद महिलाओं के मन से भय खत्म नहीं हुआ है।
पहाड़ों में बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष
पर्वतीय जिलों में हालात और भी चिंताजनक हैं। यहां महिलाएं रोजमर्रा के काम चारा लाने, लकड़ी इकट्ठा करने, पानी भरने और खेतों में काम करने के दौरान सीधे वन्यजीवों के संपर्क में आती हैं।
वर्ष 2025 में गुलदार, बाघ और भालू के हमलों में कुल 562 लोग शिकार बने, जिनमें 304 महिलाएं और 252 पुरुष शामिल थे। यानी कुल हमलों में लगभग 55 से 60 प्रतिशत महिलाएं प्रभावित हुईं।
गुलदार के हमलों में 15 लोगों की मौत और 98 घायल, बाघ के हमलों में 12 मौतें और 5 घायल, जबकि भालू के हमलों में 8 मौतें और 95 लोग घायल हुए। भालू और गुलदार जैसे हमलों में कई इलाकों में 65 से 70 प्रतिशत तक महिलाएं ही निशाना बनीं।
महिलाएं क्यों बनती हैं आसान शिकार?
वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक सामाजिक ढांचा भी इसकी बड़ी वजह है। पर्वतीय क्षेत्रों में घर और खेत की ज्यादातर जिम्मेदारी महिलाओं पर होती है। पुरुषों के पलायन के कारण जंगल और खेत का काम अधिकतर महिलाएं ही संभालती हैं।
राजाजी टाइगर रिजर्व के ऑनरेरी वार्डन राजीव तलवार का कहना है कि, घास काटने या खेतों में झुककर काम करने के दौरान महिलाएं वन्यजीवों को अपेक्षाकृत आसान शिकार लगती हैं, जिससे हमलों की आशंका बढ़ जाती है।
गांवों में डर का माहौल
ग्रामीण क्षेत्रों में जंगल और गांव के बीच की दूरी लगभग खत्म हो चुकी है। गुलदार और भालू अक्सर रिहायशी इलाकों के पास देखे जाते हैं, जबकि कई जगह बाघ की मौजूदगी ने लोगों में दहशत फैला दी है।
बच्चों को स्कूल भेजना बंद किया जा सकता है, लेकिन मवेशियों की देखभाल और खेत का काम रोकना महिलाओं के लिए संभव नहीं। यही मजबूरी उन्हें खतरे के बीच खड़ा कर देती है।
केवल जागरूकता नहीं, ठोस नीति की जरूरत
विशेषज्ञों का मानना है कि, केवल जागरूकता अभियान इस समस्या का हल नहीं हैं। गांवों के आसपास प्रभावी फेंसिंग, त्वरित मुआवजा, वैकल्पिक आजीविका, समूह में जंगल जाने की व्यवस्था और स्थानीय स्तर पर त्वरित सहायता तंत्र को मजबूत करना जरूरी है। साथ ही मानव-वन्यजीव संघर्ष को महिला सुरक्षा और सामाजिक नीति से जोड़कर देखने की आवश्यकता है।
उत्तराखंड की महिलाएं आज दोहरी मार झेल रही हैं। मैदानों में अपराध का डर और पहाड़ों में जंगल का खौफ। जब तक इस संकट को लैंगिक दृष्टिकोण से नहीं समझा जाएगा, तब तक महिलाओं की सुरक्षा केवल आंकड़ों और दावों तक सीमित रह जाएगी।
सोर्स:- ETV उत्तराखंड़



