बिग ब्रेकिंग: आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराया गया पति हाईकोर्ट से बरी

आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप में दोषी ठहराया गया पति हाईकोर्ट से बरी

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए सत्र न्यायालय, ऊधम सिंह नगर द्वारा दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी कर दिया है।

न्यायालय ने वर्ष 2011 में सुनाए गए दोषसिद्धि के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि मात्र संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने पारित किया। मामला वर्ष 2004 में खटीमा क्षेत्र में हुई आत्महत्या की घटना से जुड़ा है। अपीलकर्ता की पत्नी ने 15 सितंबर 2004 को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या के कोई संकेत नहीं मिले थे।

सत्र न्यायालय ने आरोपी को दहेज हत्या और दहेज उत्पीड़न के आरोपों से बरी कर दिया था, लेकिन भारतीय दंड संहिता की धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

आरोप था कि पति को पत्नी के चरित्र पर संदेह था और उसने मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिससे आहत होकर उसने आत्मघाती कदम उठाया।

फैसले के खिलाफ दायर आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन किया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान सामान्य प्रकृति के थे और आत्महत्या से ठीक पहले किसी प्रत्यक्ष उकसावे या विशिष्ट घटना का ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। मामले में कोई आत्महत्या नोट भी बरामद नहीं हुआ।

उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में टिप्पणी की कि “संदेह चाहे कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सबूत का स्थान नहीं ले सकता।” अदालत ने कहा कि केवल वैवाहिक विवाद या चरित्र पर संदेह को आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं माना जा सकता, जब तक कि स्पष्ट और प्रत्यक्ष उकसावे का प्रमाण न हो।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने सत्र अदालत का 30 अगस्त 2011 का आदेश रद्द करते हुए अपीलकर्ता को धारा 306 के आरोप से दोषमुक्त करार दे दिया।