उत्तराखंड पुलिस में 24 साल में सब-इंस्पेक्टर पदों की सबसे कम बढ़ोतरी
देहरादून। उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद बीते 24 वर्षों में पुलिस विभाग की संरचना में असंतुलन सामने आया है। पुलिस मुख्यालय से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, सब-इंस्पेक्टर (एसआई) के पदों में प्रतिशत के लिहाज से सबसे कम वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि वरिष्ठ पदों में कई गुना इजाफा हुआ है।
आरटीआई से मिले आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2000 में राज्य गठन के समय उत्तराखंड में भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारियों की संख्या 19 थी, जो वर्तमान में बढ़कर 67 हो गई है।
इस दौरान आईपीएस पदों में 252 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं प्रांतीय पुलिस सेवा (पीपीएस) अधिकारियों की संख्या 38 से बढ़कर 111 हो गई, जो 192 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाती है।
इसी तरह क्षेत्राधिकारी (सीओ) के पद 31 से बढ़कर 72 हो गए, जिसमें 132 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इंस्पेक्टर पदों की संख्या में सबसे अधिक इजाफा दर्ज किया गया, जो 55 से बढ़कर 268 हो गई। यह वृद्धि 387 प्रतिशत रही।
इसके विपरीत, थानों में प्रत्यक्ष रूप से कानून-व्यवस्था और विवेचना से जुड़े सब-इंस्पेक्टर पदों की संख्या 612 से बढ़कर 1134 हुई है। यह वृद्धि मात्र 85 प्रतिशत रही, जो सभी श्रेणियों में सबसे कम है।
सब-इंस्पेक्टर पुलिस विभाग की वह कड़ी माने जाते हैं, जो एफआईआर दर्ज करने, अपराधों की जांच, पीड़ितों से संवाद, आरोप-पत्र दाखिल करने और थाना स्तर पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने जैसे अहम दायित्व निभाते हैं। इसके बावजूद इस पद पर अपेक्षाकृत कम विस्तार विभागीय ढांचे पर सवाल खड़े करता है।
आरटीआई से प्राप्त ये आंकड़े यह संकेत देते हैं कि वरिष्ठ पदों के मुकाबले जमीनी स्तर पर कार्यरत अधिकारियों की संख्या में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। इससे थानों पर कार्यभार बढ़ने और मामलों के निस्तारण में देरी जैसी स्थितियां उत्पन्न होने की आशंका जताई जा रही है।
पुलिस विभाग की संरचना से जुड़े इन आंकड़ों के सामने आने के बाद भर्ती प्रक्रिया और फील्ड स्तर की जरूरतों के अनुसार पद सृजन को लेकर समीक्षा की मांग उठ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनसुरक्षा को प्रभावी बनाने के लिए सब-इंस्पेक्टर जैसे प्रमुख फील्ड पदों को सशक्त करना आवश्यक है।



