हाईकोर्ट ने दो महत्वपूर्ण फैसलों पर दिये अहम आदेश। आप भी पढ़ें….
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर शारीरिक संबंध बनाने के एक मामले में आरोपी को अग्रिम जमानत प्रदान की है। न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा ने 29 दिसंबर 2025 को यह आदेश पारित किया था, जो 1 जनवरी 2026 को सार्वजनिक हुआ।
मामले के अनुसार, उधम सिंह नगर जिले के जसपुर थाने में 9 मई 2025 को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 69 (विवाह के झूठे वादे या धोखे से संबंध बनाने से संबंधित) और धारा 351(2) (आपराधिक धमकी) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।
शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि आरोपी ने शादी का वादा कर उससे शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया।
आरोपी की दलील
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से बने थे। महिला बालिग और समझदार है तथा आरोपी ने विवाह का कोई झूठा वादा नहीं किया था। अधिवक्ता ने यह भी दलील दी कि आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि, “सहमति से बने हर रिश्ते को शादी के झूठे वादे पर आधारित नहीं माना जा सकता। वादा तोड़ना तभी अपराध की श्रेणी में आएगा, जब यह साबित हो कि शुरुआत से ही विवाह करने का कोई इरादा नहीं था। हालांकि, इसका अंतिम निर्धारण ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।”
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को ध्यान में रखते हुए आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने निर्देश दिए कि गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपी को निजी मुचलके और दो जमानती प्रस्तुत करने पर रिहा किया जाए।
भीमताल जोन स्टेट में निर्माण कार्यों पर हाईकोर्ट में सुनवाई, फैसला सुरक्षित
क्रम में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भीमताल स्थित जोन स्टेट क्षेत्र में कथित अवैध निर्माण कार्यों को लेकर दायर जनहित याचिका पर भी सुनवाई की। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि वन विभाग की अनुमति के बिना किसी भी प्रकार का पेड़ कटान नहीं किया जाएगा।
जनहित याचिका में लगाए गए आरोप
याचिकाकर्ता पीटर द्वारा दायर जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि जोन स्टेट क्षेत्र में वन विभाग की भूमि पर अतिक्रमण कर निर्माण कार्य किए जा रहे हैं। याचिका में यह भी कहा गया कि बिना सक्षम प्राधिकरण और पर्यावरण विभाग की अनुमति के भारी मशीनों का उपयोग किया गया।
याचिकाकर्ता का दावा है कि यह भूमि वन विभाग के अधीन है, न कि राजस्व विभाग के, और इससे संबंधित रिकॉर्ड भी कथित रूप से गायब हो चुका है। पूर्व में हाईकोर्ट ने मामले की जांच के आदेश दिए थे, लेकिन अब तक कोई ठोस जांच नहीं की गई।

