सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला। सज्जादानशीन और मुतवल्ली अलग पद, हाईकोर्ट का आदेश रद्द
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दरगाह और वक्फ प्रबंधन से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि सज्जादानशीन और मुतवल्ली के पद मूल रूप से अलग-अलग हैं।
अदालत ने कहा कि सज्जादानशीन एक आध्यात्मिक पद है, जबकि मुतवल्ली की भूमिका धर्मनिरपेक्ष प्रशासनिक होती है।
जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने कर्नाटक की एक दरगाह में सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार से जुड़े विवाद पर यह फैसला सुनाया।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि,
- सज्जादानशीन वक्फ का आध्यात्मिक प्रमुख होता है
- मुतवल्ली केवल प्रबंधन और प्रशासनिक कार्य देखता है
- दोनों पदों को एक समान नहीं माना जा सकता
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 32(2)(g) के तहत नियुक्त सज्जादानशीन, मुतवल्ली के कार्य कर सकता है, लेकिन मुतवल्ली कभी भी सज्जादानशीन की भूमिका नहीं निभा सकता।
हाईकोर्ट के फैसले पर टिप्पणी
मामले में हाईकोर्ट ने यह कहते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले रद्द कर दिए थे कि यह विवाद वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में आता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत मानते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया। ट्रायल कोर्ट का फैसला बहाल किया और मामले को दोबारा सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेज दिया
साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि मामले का निपटारा 9 महीने के भीतर किया जाए।
उत्तराधिकार पर भी स्पष्टता
कोर्ट ने कहा कि धार्मिक पदों पर उत्तराधिकार परंपराओं, रीति-रिवाजों या मौजूदा पदाधिकारी द्वारा नामांकन (Nomination) के आधार पर तय होता है, न कि सख्त कानूनी उत्तराधिकार नियमों से।
यह विवाद कर्नाटक की दरगाह में सज्जादानशीन पद के उत्तराधिकार से जुड़ा था, जिसमें परिवार के भीतर दावेदारी को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही थी।
ट्रायल कोर्ट ने सैयद मोहम्मद आदिल पाशा क़ादरी को वैध सज्जादानशीन माना था, जिसे हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी साक्ष्यों की समीक्षा के बाद पाया कि, 1981 का ‘ख़िलाफ़तनामा’ वैध था नामांकन की प्रक्रिया सही तरीके से हुई थी और अपीलकर्ता के दावे पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में कमजोर थे।
कोर्ट का स्पष्ट संदेश
अदालत ने यह भी कहा कि, सज्जादानशीन की नियुक्ति एक धार्मिक मामला है। किसी एक व्यक्ति को सज्जादानशीन मान्यता देने से अन्य लाभार्थियों के कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होते।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला वक्फ संस्थानों और दरगाह प्रबंधन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जो भविष्य में ऐसे विवादों के समाधान के लिए स्पष्ट दिशा प्रदान करेगा।



