धार्मिक अवसर पर छुट्टी मौलिक अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता में यह अधिकार शामिल नहीं है कि राज्य किसी धार्मिक अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करे।
कोर्ट ने कहा कि भारत जैसे विकासशील देश में उत्पादकता और कार्य की निरंतरता को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
PIL खारिज, नीति का विषय बताया
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने ‘ऑल इंडिया शिरोमणि सिंह सभा’ की जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। याचिका में गुरु गोबिंद सिंह के प्रकाश पर्व को पूरे देश में राजपत्रित अवकाश घोषित करने की मांग की गई थी।
कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक अवकाश घोषित करना पूरी तरह से नीतिगत निर्णय है, जिसमें आर्थिक प्रभाव, प्रशासनिक दक्षता और शासन से जुड़े पहलुओं पर विचार किया जाता है, यह न्यायिक दखल का विषय नहीं है।
गुरु गोबिंद सिंह को श्रद्धांजलि, लेकिन छुट्टी समाधान नहीं
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गुरु गोबिंद सिंह के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी शिक्षाएं “किरत करो” (ईमानदारी से कमाओ) और “वंड छको” (साझा करो) पर आधारित हैं।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि उनकी विरासत का सम्मान कर्तव्यों का पालन करके किया जाना चाहिए, न कि केवल छुट्टी की मांग करके।
छुट्टियों में बढ़ोतरी से उत्पादकता पर असर
सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि बिना सोचे-समझे राजपत्रित अवकाशों में वृद्धि से
- प्रशासनिक कार्य प्रभावित होंगे
- आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ेगा
- सार्वजनिक उत्पादकता घटेगी
कोर्ट ने कहा कि, “काम न होने वाले दिनों को बढ़ाने का आदेश देना न्यायिक सीमा से बाहर का विषय है।”
संघीय ढांचे पर भी जोर
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की संघीय व्यवस्था में अलग-अलग राज्यों में अलग छुट्टियां होना स्वाभाविक है।
यह अनुच्छेद 14 के तहत भेदभाव नहीं माना जाएगा।
अनुच्छेद 25 का हवाला गलत
कोर्ट ने साफ कहा कि,
- अनुच्छेद 25 धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है।
- लेकिन यह अधिकार राज्य से छुट्टी की मांग करने तक विस्तारित नहीं होता।
न्यायिक अतिरेक पर चेतावनी
बेंच ने कहा कि यदि ऐसी मांगें स्वीकार की जाती हैं, तो:
विभिन्न समूहों से इसी तरह की मांगों की बाढ़ आ सकती है
इससे अवकाशों का “अव्यावहारिक विस्तार” होगा
शासन और प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होगा
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि,
- धार्मिक आस्था का सम्मान ज़रूरी है,
- लेकिन सार्वजनिक अवकाश घोषित करना मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि सरकार की नीति का विषय है।




