बाजारों से मोबाइल स्क्रीन तक सिमटी खरीदारी। रंग तो खूब, पर खरीदार आधे
देहरादून सहित देशभर में होली का उल्लास दिखाई दे रहा है। बाजार सजे हैं, दुकानों में रंग, गुलाल, पिचकारियां और गिफ्ट पैक सलीके से सजाए गए हैं।
हर वर्ष की तरह इस बार भी व्यापारियों ने 15–20 दिन पहले से तैयारी की, लेकिन इस बार उत्साह के बीच एक गहरी चिंता भी है, बिक्री उम्मीद के अनुरूप नहीं हो रही।
यह केवल एक शहर की कहानी नहीं, बल्कि बदलती आर्थिक और उपभोक्ता संस्कृति का संकेत है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की बढ़ती पकड़ ने पारंपरिक बाजारों की रफ्तार को धीमा कर दिया है।
उनका दावा है कि बिक्री में 30 से 50 प्रतिशत तक गिरावट आई है। त्योहारों पर जो भीड़ कभी बाजारों की पहचान हुआ करती थी, वह अब मोबाइल स्क्रीन तक सिमटती जा रही है।
कोरोना काल के बाद ऑनलाइन खरीदारी की आदत ने स्थायी रूप ले लिया। सुविधा, घर तक डिलीवरी और डिस्काउंट ऑफर ने उपभोक्ताओं को आकर्षित किया।
भले ही कई बार ऑनलाइन कीमतें बाजार से अधिक हों, लेकिन समय की बचत और भीड़ से राहत का विकल्प ग्राहकों को लुभा रहा है। परिणामस्वरूप, होलसेल से लेकर छोटे खुदरा दुकानदार तक दबाव महसूस कर रहे हैं।
यह स्थिति केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का प्रश्न नहीं है; यह स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक संरचना से भी जुड़ा मुद्दा है। छोटे व्यापारी केवल सामान नहीं बेचते, वे शहर की आर्थिक धड़कन का हिस्सा होते हैं।
उनके माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित होता है और आर्थिक गतिविधियां संचालित होती हैं। यदि त्योहारों पर भी बाजारों की रौनक घटेगी, तो इसका दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है।
ऐसे समय में राष्ट्रीय स्तर पर भी इस मुद्दे पर चर्चा जरूरी है। पंकज मैसोन, जो राष्ट्रीय व्यापारी कल्याण बोर्ड से जुड़े हैं, लंबे समय से पारंपरिक व्यापारियों की चुनौतियों को उठाते रहे हैं।
उनका मानना है कि डिजिटल युग की प्रतिस्पर्धा को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन छोटे और मध्यम व्यापारियों के लिए संतुलित नीतिगत समर्थन आवश्यक है। यदि ऑनलाइन और ऑफलाइन व्यापार के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो स्थानीय बाजारों की बुनियाद कमजोर हो सकती है।
सरकार के लिए यह विचारणीय विषय है कि डिजिटल विस्तार के साथ-साथ पारंपरिक व्यापार की सुरक्षा और सशक्तिकरण के उपाय भी किए जाएं। कर ढांचे, स्थानीय बाजारों के बुनियादी ढांचे और डिजिटल सशक्तिकरण के माध्यम से छोटे व्यापारियों को नई प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तैयार करना होगा।
होली रंगों का त्योहार है। मेलजोल, सामाजिक संवाद और स्थानीय संस्कृति का प्रतीक। यदि त्योहारों की खरीदारी केवल ऑनलाइन लेनदेन बनकर रह जाएगी, तो बाजारों की वह सामुदायिक ऊर्जा भी क्षीण हो जाएगी जो भारतीय समाज की पहचान है।
समय की मांग है कि तकनीक और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। डिजिटल सुविधा का लाभ उपभोक्ताओं को मिले, लेकिन स्थानीय बाजारों की रौनक भी बनी रहे, तभी त्योहारों के रंग सच मायनों में गहरे और स्थायी रह पाएंगे।



