सामूहिक दुष्कर्म मामले में साक्ष्यों के अभाव में दो आरोपी
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हल्द्वानी के बनभूलपुरा क्षेत्र में मानसिक रूप से दिव्यांग युवती के साथ हुए कथित सामूहिक दुष्कर्म और अपहरण के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैठानी और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने वर्ष 2019 की दो अलग-अलग आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सामूहिक दुष्कर्म की सजा को पलट दिया।
अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और फॉरेंसिक नमूनों की सुरक्षा में बरती गई लापरवाही को आरोपियों को बरी करने का मुख्य आधार बनाया।
मानसिक दिव्यांग युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप
मामले के अनुसार 7 मार्च 2018 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा की रहने वाली एक युवती अचानक लापता हो गई थी। पीड़िता के भाई ने अगले दिन गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट में बताया गया कि युवती मानसिक रूप से दिव्यांग है और बोलने में सक्षम नहीं है।
8 मार्च की रात युवती एक पेट्रोल पंप के पास डरी-सहमी हालत में मिली। घर लाने पर उसकी मां ने कपड़ों पर खून के धब्बे और शरीर पर चोट के निशान देखे। युवती ने इशारों में दो व्यक्तियों द्वारा यौन उत्पीड़न की बात कही।
वैज्ञानिक साक्ष्यों पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
खंडपीठ ने अपने निर्णय में फॉरेंसिक साक्ष्यों की ‘चेन ऑफ कस्टडी’ (कब्जे की श्रृंखला) पर गंभीर सवाल उठाए।
अभियोजन पक्ष ने आरोपी के कपड़ों पर मिले डीएनए को मुख्य सबूत के रूप में प्रस्तुत किया था।
अदालत ने पाया कि पुलिस यह सिद्ध नहीं कर पाई कि बरामद कपड़ों को लैब भेजे जाने तक सुरक्षित और सीलबंद स्थिति में रखा गया था।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि जब तक बरामदगी की ईमानदारी और सुरक्षा का दस्तावेजी प्रमाण न हो, तब तक वैज्ञानिक रिपोर्ट को निर्णायक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
दूसरे आरोपी के मामले में फॉरेंसिक रिपोर्ट और भी कमजोर रही। पीड़िता के कपड़ों या शरीर से लिए गए नमूनों में उसका डीएनए नहीं पाया गया। डीएनए प्रोफाइलिंग ने उसे यौन हमले से बाहर रखा।
अदालत ने कहा कि केवल संदेह या साथ देखे जाने के आधार पर किसी को दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
अपहरण में दोषसिद्धि बरकरार
हालांकि, अदालत ने दूसरे आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण) के तहत दोषी माना।
सीसीटीवी फुटेज में आरोपी को युवती का हाथ पकड़कर ले जाते हुए देखा गया था।
मेडिकल रिपोर्ट में युवती की आयु 18–20 वर्ष के बीच बताई गई, लेकिन अदालत ने उसकी मानसिक स्थिति को ध्यान में रखा।
न्यायालय ने कहा कि उसकी बौद्धिक अक्षमता के कारण ‘सहमति’ का कोई कानूनी महत्व नहीं था। ऐसे व्यक्ति को अभिभावकों की अनुमति के बिना ले जाना अपहरण की श्रेणी में आता है।
हालांकि, धारा 376-D (सामूहिक दुष्कर्म) के तहत दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं पाए गए, इसलिए आरोपी को इन आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
चार साल की सजा पूरी, रिहाई के आदेश
निचली अदालत ने अपहरण के लिए आरोपी को 4 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत को बताया गया कि वह पहले ही चार वर्ष से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
इस आधार पर हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।
पहले आरोपी को पूर्ण बरी
पहले आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए अदालत ने उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया और तत्काल रिहाई के आदेश जारी किए।
फैसले का व्यापक संदेश
यह निर्णय आपराधिक मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्यों की शुचिता और जांच प्रक्रिया की पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि के लिए केवल आरोप या परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर्याप्त नहीं, बल्कि ठोस और सुरक्षित प्रमाण आवश्यक हैं।



