नाबालिग दुष्कर्म आरोपी उस्मान को राहत नहीं, बनभूलपुरा कांड में मोकिन सैफी को जमानत
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग संवेदनशील मामलों में महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं। नैनीताल में 12 वर्षीय नाबालिग से कथित दुष्कर्म के आरोपी ठेकेदार उस्मान खान को जमानत पर फिलहाल कोई राहत नहीं मिली है, जबकि हल्द्वानी के बनभूलपुरा कांड से जुड़े आरोपी मोकिन सैफी को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है।
नैनीताल दुष्कर्म प्रकरण में न्यायमूर्ति आलोक कुमार मेहरा की एकलपीठ ने उस्मान खान की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए अगली तारीख 16 फरवरी 2026 निर्धारित की है।
आरोपी पक्ष की ओर से दलील दी गई कि वह लंबे समय से जेल में निरुद्ध है और मामला सोशल मीडिया व मीडिया में अत्यधिक चर्चित हो चुका है। बचाव पक्ष का कहना है कि आरोपी ने कोई दुष्कर्म नहीं किया है और उसे जमानत पर रिहा किया जाना चाहिए।
मामले के अनुसार, उस्मान खान पर 12 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म का आरोप है। पीड़िता के परिजनों द्वारा मल्लीताल कोतवाली में शिकायत दर्ज कराई गई थी। घटना के बाद स्थानीय स्तर पर आक्रोश और विरोध-प्रदर्शन हुआ था।
पुलिस ने जांच के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया था, जहां वह वर्तमान में निरुद्ध है। जमानत पर अंतिम निर्णय अगली सुनवाई में केस डायरी और प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर लिया जाएगा।
वहीं, हल्द्वानी के चर्चित बनभूलपुरा कांड में वरिष्ठ न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने आरोपी मोकिन सैफी की जमानत मंजूर कर ली है।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास गुगलानी ने अदालत को बताया कि मोकिन सैफी का नाम प्राथमिकी में नहीं है और उन्हें संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया। दलील दी गई कि दंगे में शामिल कई अन्य आरोपियों को पूर्व में जमानत मिल चुकी है, इसलिए समानता के आधार पर उन्हें भी राहत दी जानी चाहिए।
बनभूलपुरा प्रकरण में अब्दुल मलिक सहित अन्य के खिलाफ दंगे के दौरान चार मुकदमे दर्ज हुए थे। एक मामले में आरोप है कि कूटरचित दस्तावेजों और झूठे शपथपत्र के आधार पर राजकीय भूमि हड़पने, नजूल भूमि पर कब्जा कर अवैध प्लॉटिंग और निर्माण कर बिक्री करने का प्रयास किया गया।
प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान पथराव और हिंसा की घटनाएं हुईं, जिसमें पुलिसकर्मी और अन्य लोग घायल हुए तथा जानमाल का नुकसान भी हुआ। आरोपियों का कहना है कि उन्हें झूठा फंसाया गया है।
दोनों मामलों में हाईकोर्ट के आदेश यह दर्शाते हैं कि अदालत प्रत्येक प्रकरण के तथ्यों, साक्ष्यों और कानूनी आधारों के अनुसार अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाती है।
जहां एक ओर गंभीर आरोपों वाले मामले में जमानत पर अभी निर्णय सुरक्षित रखा गया है, वहीं दूसरे मामले में अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर राहत प्रदान की है।



