बिग ब्रेकिंग: SC-ST-OBC की सीमित भागीदारी, हाईकोर्ट नियुक्तियों में ऊंची जातियों का वर्चस्व

बिग ब्रेकिंग: SC-ST-OBC की सीमित भागीदारी, हाईकोर्ट नियुक्तियों में ऊंची जातियों का वर्चस्व

नई दिल्ली: उच्च न्यायपालिका में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्रीय कानून मंत्रालय ने संसद को बताया है कि 1 जनवरी 2021 से 30 जनवरी 2026 के बीच सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट में नियुक्त लगभग तीन-चौथाई जज ऊंची जातियों से संबंधित हैं।

यह जानकारी कानून और न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 5 फरवरी 2026 को राज्यसभा सांसद पी. विल्सन के एक अतारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

आंकड़ों में क्या है हकीकत

सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, इस अवधि में विभिन्न हाईकोर्ट में कुल 593 जजों की नियुक्ति की गई। इनमें से—

  • अनुसूचित जाति (SC): 26 जज (4.38%)
  • अनुसूचित जनजाति (ST): 14 जज (2.36%)
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 80 जज (13.49%)
  • अल्पसंख्यक समुदाय: 37 जज (6.23%)
  • सामान्य/ऊंची जातियां: 436 जज (73.52%)
  • इसके अलावा इसी अवधि में 96 महिलाओं को हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्त किया गया।

सामाजिक विविधता पर सरकार का पक्ष

पी. विल्सन ने अपने सवाल में उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी मांगी थी।

इसके जवाब में सरकार ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।

मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इसी कारण कैटेगरी-वाइज डेटा केंद्रीय रूप से संकलित नहीं किया जाता। हालांकि,

वर्ष 2018 से हाईकोर्ट जज के लिए सिफारिश किए जाने वाले उम्मीदवारों को सुप्रीम कोर्ट से परामर्श के बाद तय किए गए एक मानक फॉर्मेट में अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी देना अनिवार्य किया गया है। संसद में प्रस्तुत आंकड़े इसी आधार पर हैं।

सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति का प्रस्ताव शुरू करने का अधिकार मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास है, जबकि हाईकोर्ट के मामलों में संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रस्ताव भेजते हैं।

सरकार ने दावा किया कि वह कॉलेजियम से एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और महिला उम्मीदवारों पर विचार करने का अनुरोध करती रही है, लेकिन नियुक्तियां केवल सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर ही होती हैं।

सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंचों पर भी जवाब

सुप्रीम कोर्ट की क्षेत्रीय बेंचों की स्थापना से जुड़े सवाल पर कानून मंत्रालय ने संविधान के अनुच्छेद 130 का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में या किसी अन्य स्थान पर बैठ सकता है, जिसका निर्णय CJI राष्ट्रपति की मंजूरी से लेते हैं।

मंत्रालय ने बताया कि 10वें, 11वें और 18वें विधि आयोग ने अतीत में सुप्रीम कोर्ट को संवैधानिक और क्षेत्रीय अपीलीय बेंचों में विभाजित करने की सिफारिश की थी।

हालांकि, 18 फरवरी 2010 को हुई सुप्रीम कोर्ट की फुल कोर्ट बैठक में दिल्ली के बाहर बेंच स्थापित करने को लेकर कोई औचित्य नहीं पाया गया।

साथ ही यह भी बताया गया कि नेशनल कोर्ट ऑफ अपील से संबंधित एक याचिका 2016 से सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है।

हाईकोर्ट में जजों की भारी कमी

कानून मंत्रालय ने संसद को यह भी जानकारी दी कि 30 जनवरी 2026 तक हाईकोर्ट में 1,122 स्वीकृत पदों के मुकाबले 308 पद रिक्त हैं। वर्तमान में केवल 814 जज कार्यरत हैं। इलाहाबाद, कलकत्ता और मद्रास हाईकोर्ट समेत कई अदालतें गंभीर जज संकट से जूझ रही हैं।