बिग ब्रेकिंग: VPDO अंतरजनपदीय तबादले मामले में सरकार को पुनर्विचार की छूट, हाईकोर्ट ने खारिज किया रद्दीकरण आदेश

VPDO अंतरजनपदीय तबादले मामले में सरकार को पुनर्विचार की छूट, हाईकोर्ट ने खारिज किया रद्दीकरण आदेश

नैनीताल। उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में तैनात ग्राम पंचायत विकास अधिकारियों (वीपीडीओ) के अंतरजनपदीय स्थानांतरण को लेकर दायर याचिकाओं पर हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।

वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने शीतकालीन अवकाश से पहले सभी याचिकाओं को स्वीकार करते हुए पंचायती राज विभाग द्वारा जारी तबादला रद्दीकरण आदेशों को खारिज कर दिया है।

कोर्ट ने निदेशक, पंचायती राज द्वारा 3 जुलाई 2024 तथा सचिव, पंचायती राज द्वारा 21 फरवरी 2025 को जारी किए गए स्थानांतरण निरस्तीकरण आदेशों को अवैध ठहराया है।

क्या है पूरा मामला

मामले की शुरुआत नवंबर 2023 में हुई, जब तत्कालीन सचिव, पंचायती राज ने कई वीपीडीओ के अनुरोध पर उन्हें एक जनपद से दूसरे जनपद में स्थानांतरित किया था।

बाद में विभाग ने यह कहते हुए इन आदेशों को निरस्त कर दिया कि वीपीडीओ जिला कैडर का पद है और इनका अंतरजनपदीय स्थानांतरण अनुमन्य नहीं है।

विभाग का यह भी तर्क था कि इन तबादलों के कारण पहाड़ी जिलों में कर्मचारियों की भारी कमी हो गई है, जबकि मैदानी जिलों में संख्या अधिक हो गई, जिससे आरक्षण व्यवस्था और प्रशासनिक संतुलन प्रभावित हुआ है।

याचिकाकर्ताओं की दलील

प्रदीप असवाल समेत अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि जब स्थानांतरण आदेश शासन स्तर के सचिव द्वारा जारी किए गए थे, तो उनके अधीनस्थ निदेशक को उन्हें रद्द करने का अधिकार नहीं है।

इसके साथ ही यह भी कहा गया कि सचिव द्वारा बाद में जारी किया गया रद्दीकरण आदेश स्वतंत्र विवेक के बजाय निदेशक की राय पर आधारित था।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि ये तबादले नियमित वार्षिक स्थानांतरण नहीं थे, बल्कि विशेष परिस्थितियों में किए गए प्रशासनिक निर्णय थे।

कोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘उत्तराखंड लोक सेवकों के लिए वार्षिक स्थानांतरण अधिनियम, 2017’ इस मामले में लागू नहीं होता। न्यायमूर्ति तिवारी ने कहा कि यह अधिनियम केवल नियमित वार्षिक तबादलों पर लागू होता है, जबकि संबंधित स्थानांतरण राज्य सरकार ने नियोक्ता के रूप में अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए किए थे।

अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर तबादलों को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि वे स्थानांतरण अधिनियम के दायरे से बाहर थे।

सरकार की चिंताओं को भी माना जायज

हालांकि, कोर्ट ने राज्य सरकार की उस चिंता को भी उचित माना, जिसमें कहा गया था कि बड़े पैमाने पर हुए तबादलों से पहाड़ी जिलों में कार्यबल की कमी और प्रशासनिक कठिनाइयां उत्पन्न हुई हैं।

कोर्ट ने माना कि वीपीडीओ जमीनी स्तर पर प्रशासन की रीढ़ हैं और उनके कैडर में असंतुलन से प्रशासनिक दक्षता प्रभावित होती है।

तीन महीने में पुनर्विचार का विकल्प

हाईकोर्ट ने रद्दीकरण आदेशों को खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत दी, लेकिन साथ ही सरकार को पुनर्विचार का अवसर भी दिया है।

अदालत ने सचिव, पंचायती राज को निर्देश दिया है कि वे प्रशासनिक दक्षता के दृष्टिगत तीन महीने के भीतर नए सिरे से आदेश पारित कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करने से पहले सभी संबंधित कर्मचारियों को सुनवाई का पूरा अवसर देना अनिवार्य होगा।