Exclusive: रिलायंस फाउंडेशन की मदद से फलफूल रहा उत्तराखंड का उद्यान विभाग

रिलायंस फाउंडेशन की मदद से फलफूल रहा उत्तराखंड का उद्यान विभाग

 

देहरादून। रिलायंस फाउंडेशन उत्तरकाशी द्वारा जनपद के भटवाड़ी विकास खण्ड के अन्तर्गत जखोल, द्वारी, रैथल, नतीण, पाला, गोरसाली, वारसू, पाई आदि गांवों का चयन वर्ष 2014-2015 में आजीविका से जुड़े कार्यों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से किया गया। इस क्षेत्र के काश्तकार पूर्व से ही आलू उत्पादन करते आ रहे हैं। किन्तु क्षेत्र के आलू बीज उत्पादन फार्म द्वारी के बन्द हो जाने के कारण क्षेत्र के काश्तकारों को प्रमाणित आलू बीज मिलना बंद हो गया। आलू का प्रमाणित बीज न मिल पाने के कारण काश्तकार सवयं के उत्पादित आलू बीज से आलू की खेती कर रहे थे, जिससे उनको आलू की बहुत कम उपज मिल रही थी।

धीरे-धीरे आलू की अलाभकारी खेती होने के कारण काश्तकार आलू की खेती छोड़ने लगे। क्षेत्र में कार्यरत रिलायंस फाउंडेशन द्वारा चयनित गांव के काश्तकारों का हिमाचल प्रदेश के लाहोल स्फित आलू उत्पादक संघ के काश्तकारों से संपर्क करवाया गया। साथ ही उनके माध्यम से ही प्रमाणित आलू बीज सवयं काश्तकारों द्वारा क्रय किया गया। जिससे पहले की अपेक्षा आलू की उपज कई गुना अधिक हुयी। अब वहां के काश्तकार हिमाचल प्रदेश के काश्तकारों से सम्पर्क कर आलू बीज की व्यवस्था स्वयंम से कर रहे हैं। इस कार्य के लिए काश्तकारों ने रिलायंस फाउंडेशन की सहायता से प्रत्येक ग्राम सभा में ग्राम विकास कोष बनाये हैं, जिसमें ग्राम वासियों द्वारा प्रत्येक माह धन जमा किया जाता है।

इस कोष का संचालन ग्राम वासी स्वयमं करते हैं। ग्राम विकास कोष से ही काश्तकार आलू बीज क्रय करते हैं। वर्तमान में 12 गांव के काश्तकार समूह में आलू का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं। उद्यान विभाग द्वारा बजट के अनुसार आलू का प्रमाणित बीज मुनस्यारी धारचुला व अन्य स्थानों से मंगा कर आधी कीमत पर आलू उत्पादकों को वितरित किया जाता है। किन्तु मांग के अनुसार यह काफी कम होता है। साथ ही दूर से लाने के कारण कभी-कभी समय पर भी उपलब्ध नहीं हो पाता है। राज्य बनने पर आश जगी थी कि विकास योजनायें राज्य की विषम भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कृषकों के हित में बनेंगी किन्तु दुर्भाग्य से जिन सपनों को लेकर राज्य की स्थापना की गयी थी वे सपने आज भी सपने बन कर रह गये हैं।

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राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार योजनाओं में सुधार नहीं हुआ। विभाग योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए कार्ययोजना तैयार करता है। कार्ययोजना में उन्हीं मदों में अधिक धनराशि रखी जाती है, जिसमें आसानी से संगठित/संस्थागत भ्रष्टाचार किया जा सके या कहें डाका डाला जा सके। योजनाओं से केवल नौकरशाहों एवं सामान आपूर्ति करने वाले दलालों का ही आर्थिक लाभ पहुंच रहा है। यदि विभाग को/शासन को सीधे कोई सुझाव/शिकायत भेजी जाती है तो कोई जवाब नहीं मिलता। प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री के समाधान पोर्टल पर सुझाव शिकायत अपलोड करने पर शिकायत शासन से संबंधित विभाग के निदेशक को जाती है। वहां से जिला स्तरीय अधिकारियों को। वहां से फील्ड स्टाफ को। अन्त में जबाव मिलता है कि किसी भी कृषक द्वारा कार्यालय में कोई लिखित शिकायत दर्ज नहीं है, सभी योजनाएं पारदर्शी ठंग से चल रही हैं।

उच्च स्तर पर योजनाओं का मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर होता है कि, विभाग को कितना बजट आवंटित हुआ और अब तक कितना खर्च हुआ। राज्य में कोई ऐसा सक्षम और ईमानदार सिस्टम नहीं दिखाई देता जो धरातल पर योजनाओं का ईमानदारी से मूल्यांकन कर योजनाओं में सुधार ला सके। योजनाओं में जब तक कृषकों के हित में सुधार नहीं किया जाता व क्रियावयन में पारदर्शिता नहीं लाई जाती कृषकों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी सोचना बेमानी है। योजनाओं पर प्रति बर्ष हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी उद्यान विभाग राज्य बनने के 19 बर्षों बाद भी आलू उत्पादकों को समय पर आलू का प्रमाणित बीज उपलब्ध नहीं करा पा रहा है। यदि इन क्षेत्रों के काश्तकारों को योजनाओं में समय पर प्रमाणित आलू का बीज उपलब्ध कराया जाय तो इन कास्तकारौ की आर्थिक स्थिति अच्छी हो सकती है।

पर्वतीय क्षेत्र के इन आलू उत्पादकों के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने होंगे। यदि यही स्थिति बनी रहती है तो इन क्षेत्रों से भी पलायन बढेगा। नीति निर्धारकों को चाहिए कि योजनाओं में आलू बीज उत्पादन की कार्य योजना बनाकर मुनस्यारी धारचुला की तरह ही चमोली जनपद के जोशीमठ एवं उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी विकासखंडों में आलू उत्पादक संघ बना कर काश्तकारों से आलू का प्रमाणित बीज उत्पादन कार्यक्रम शुरू करने का प्रयास करना चाहिए। साथ ही पूर्व की भांति हर जनपद में आलू बीज उत्पादन फार्म विकसित किए जायें, जिससे ऊंचाई व अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फिर से समय पर प्रमाणित आलू बीज से लाभ कारी उपज प्राप्त कर सकें।