Exclusive: उत्तराखंड उद्यान विभाग में गड़बड़झाला, कृषकों को समय पर नहीं मिलता आलू का प्रमाणित बीज

उत्तराखंड उद्यान विभाग में गड़बड़झाला, कृषकों को समय पर नहीं मिलता आलू का प्रमाणित बीज

 

डॉ राजेंद्र कुकसाल
देहरादून। आलू की व्यवसायिक खेती उत्तराखंड के ऊंचाई व अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सदियों से होती आ रही है। आलू उत्पादन इन क्षेत्रों के काश्तकारों की रोजी-रोटी व आजीविका से जुड़ा हुआ विषय है। उत्तराखंड के नीति निर्धारकों के गलत निर्णयों के कारण आज इन पर्वतीय क्षेत्रों के आलू उत्पादक आलू का प्रमाणित बीज न मिल पाने के कारण परेशान व निराश हैं। जिस कारण वह रोजी रोटी के लिए पलायन करने को मजबूर हैं। इन क्षेत्रों में आलू उत्पादन का क्षेत्रफल काफी घटा है।

उत्तराखंड राज्य बनने से पूर्व पर्वतीय क्षेत्रों के प्रत्येक जनपद में एक या दो आलू बीज उत्पादन फार्म होते थे। टिहरी जनपद में धनौल्टी, काणाताल उत्तरकाशी में द्वारी, रैथल पौड़ी में भरसार, खपरोली रुद्रप्रयाग में चिरबटिया, घिमतोली, चमोली जिले में परसारी, कोटी, रामणी पिथौरागढ़ में मुनस्यारी, धारचुला अल्मोड़ा में दूनागिरी, जागेश्वर नैनीताल जनपद में गागर, रामगढ़ आदि। इन विभागीय आलू फार्मों में हिमाचल प्रदेश के कुफरी या अन्य क्षेत्रों से आलू का फाउंडेशन बीज मंगा कर आलू का प्रमाणित बीज तैयार किया जाता था, जिसे मांग के अनुसार स्थानीय काश्तकारों को आलू बुवाई के समय वितरित किया जाता था। आलू के प्रमाणित बीज की मांग बहुत अधिक रहती है।

इन आलू फार्मों में कुछ काश्तकार दैनिक श्रमिक के रूप मात्र इसलिए कार्य करते थे कि, उन्हें आलू बीज की छर्री याने ग्रेडिंग के बाद जो छोटा आलू का बीज बच जाता है। उन्हें मिल सके। क्योंकि दैनिक श्रमिकों को ही आलू की छर्रियां उचित मूल्य पर दी जाती थी। ऐसा मेरा आलू फार्म गागर जनपद नैनीताल का अनुभव रहा है। देश में मात्र 30 प्रतिशत ही आलू का प्रमाणित बीज उपलब्ध हो पाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में आलू बीज उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं तथा इन क्षेत्रों में उत्पादित आलू बीज की मांग अधिक रहती है। पर्वतीय क्षेत्रों में उत्पादित प्रमाणित आलू बीज बोने से काश्तकारों को 16/20 गुना से भी अधिक उपज मिलती है, वहीं बाजार से क्रय किए गए सामान्य व अपनी पुरानी फसल से रखे आलू बीज से उपज काफी कम याने 3-4 गुना ही आलू की उपज मिल पाती है।

अस्सी के दशक में बीज प्रमाणीकरण संस्था का कार्यालय चमोली जनपद के कर्णप्रयाग में खोला गया था, जिससे पर्वतीय क्षेत्रों के काश्तकार आसानी से प्रमाणीकरण कर प्रमाणित आलू बीज का उत्पादन कर सकें। इस कार्य के लिए जोशीमठ, मुनस्यारी व उत्तरकाशी में उद्यान विभाग के अतिरिक्त कर्मचारियों को आलू के प्रमाणित बीज उत्पादन हेतु नियुक्त भी किया गया था। उत्तराखंड राज्य बनने पर उमीद जगी थी कि पर्वतीय क्षेत्रों के काश्तकारों की आर्थिक स्थिति में सुधार आएगा, किन्तु अलग राज्य बनते ही उत्तराखंड के नीति निर्धारकों द्वारा उद्यान विभाग के आलू बीज उत्पादन फार्मों को बन्द कर दिया गया।

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इन फार्मों को स्वयंम सेवी संस्थाओं तथा पन्त नगर विश्व विद्यालय को हस्थानान्तरण कर दिया गया। इन आलू फार्मौ के बन्द होने से स्थानीय काश्तकारों को आलू का प्रमाणित बीज मिलना बंद हो गया। उद्यान विभाग द्वारा आलू बीज की कोई अतिरिक्त व्यवस्था आलू उत्पादकों के लिए नहीं की गई। काश्तकारों ने स्वयंम के आलू बीज से या बाजार में उपलब्ध सामान्य किस्म के आलू की बुवाई की जिससे उनको आलू की बहुत कम उपज मिली। काश्तकार को आलू की खेती कम उपज के कारण अलाभ कारी लगने लगी जिस कारण आलू की खेती कम होती गई।

उद्यान विभाग द्वारा फरवरी मार्च माह में काशीपुर व अन्य मैदानी क्षेत्रों में उगाया गया नया बीज का आलू बिना dormancy break किये, कई पर्वतीय क्षेत्रों में भेजने से भी आलू उपज पर प्रतिकूल असर पड़ा। आज इन क्षेत्रों के काश्तकारों के सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है। हजारों हैक्टेयर आलू फार्मों के बन्द होने के बाद भी उद्यान विभाग के 2015-2016 के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में 25889.76 हैक्टेयर क्षेत्र फल में आलू की खेती की जाती है, जिससे 358244.23 मेंट्रिक टन आलू का उत्पादन होना दर्शाया गया है, जो कि विश्वसनीय नहीं लगता।

पिथौरागढ़ जनपद के मुनस्यारी, धारचुला व मदकोट क्षेत्र में बौना, गांधीनगर, क्वीरी सरमोली, गोल्फा, निर्तोली, गिरगांव आदि लगभग 40 से भी अधिक गांवों के कृषक सहकारिता के माध्यम से आलू प्रमाणित बीज का अच्छा उत्पादन कर रहे हैं। अन्य जनपदों में भी इसी तरह के प्रयास होने चाहिए। उत्तरकाशी जनपद के भटवाड़ी व चमोली जिले के जोशीमठ विकास खंडों में आलू प्रमाणित बीज उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं।