Exclusive: गृहमंत्री बने भाजपा अध्यक्ष नड्डा के समक्ष चुनौतियों का सामना

गृहमंत्री बने भाजपा अध्यक्ष नड्डा के समक्ष चुनौतियों का सामना

 

– राजनीतिक परिदृश्य में नड्डा का कार्यकाल चुनौतियों से भरा हुआ
– अमित शाह को यूं ही नहीं कहा जाता आधुनिक चाणक्य
– नड्डा को तलाशनी होगी अमित शाह से आगे बढ़कर भाजपा के लिए लकीर खिंचने की कला
– मौजूद है एक शाह के बाद दूसरा शाह भाजपा की कश्ती को पार लगाने वाला

वरिष्ठ पत्रकार- सलीम रज़ा
कहते हैं ‘‘जो जीता वही सिकन्दर’’ ऐसे में भगवा ब्रिगेड के सारथी जेपी नड्डा की राह इतनी आसान नज़र नहीं आ रही है। कम से कम बदलते राजनीतिक परिदृश्य में ऐसा ही प्रतीत हो रहा है। यह बात सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि, भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद तक पहुंचना बहुत सारी अग्नि परीक्षाओं से होकर गुजरना पड़ता है और भारतीय जनता पार्टी की ये रिवायत भी रही है कि, इस पार्टी के अन्दर अध्यक्ष पद पर सुशोभित होने वाला शख्स अपनी योगयता और एक कार्यकर्ता के रूप में अपने अनुभवों के आधार पर ही चुने जाते रहेे हैं। अब जेपी नड्डा विधिवत अध्यक्ष घोषित किये गये हैं, हालांकि वो कार्यकारी अध्यक्ष भी रह चुके है, वैसे जेपी नड्डा कोई नया नाम नहीं है। लेकिन पूर्व अध्यक्ष अमित शाह ने भाजपा के लिए जो लकीर खींची है उससे आगे लकीर खींचने की कला नड्डा को तलाशनी ही होगी।

अपने अध्यक्ष के कार्यकाल को सफल संपन्न करने वाले अमित शाह ने लोकसभा चुनाव से लेकर कई राज्यों के चुनाव तक एक विशेष तौर पर पार्टी का नेतृत्व किया था। एक पार्टी के साधारण कार्यकर्ता से लेकर पार्टी अध्यक्ष पद के अपने सफर तक उन्होंने अपनी कार्यकुशलता से ये साबित कर दिया कि, उनका मूल मंत्र पार्टी को जिताना ही नहीं बल्कि राजनीतिक विजय हासिल करने की रणनीति भी उनके अन्दर कूट-कूट कर भरी है। अमित शाह को यूं ही नहीं आधुनिक चाणक्य कहा जाता था, बल्कि उन्होंने ये दिखाया भी। वो भी ऐसे समय में जब कुछ राज्यों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं हो पाया था। लेकिन अमित शाह ने उन राज्यों में भाजपा की सरकार बनवाकर साबित कर दिया कि, वो पार्टी के ‘‘शाह’’ हैं। अमित शाह की ऐसी विषम सफलताओं की कसौटी पर नड्डा को भी खरा उतरना पड़ेगा।

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हालांकि नड्डा अपनी क्षमता का परिचय एक कुशल कार्यकर्ता और संगठक के रूप में कई राज्यों में दे भी चुके हैं। लेकिन वो दौर अमित शाह के सान्निध्य में था। अब जो सवाल मन में तैर रहा है वो ये है कि, अमित शाह ने जो एक लम्बी लकीर खींच दी है क्या नड्डा उसे और आगे ले जायेंगे? क्योंकि अध्यक्ष पद संभालते ही उनके सामने दिल्ली विधान सभा का चुनाव है। ऐसे में उनका कार्यकाल आसान होने के आसार तो कम ही दिखाई पड़ रहे हैं। आज के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में नड्डा का कार्यकाल चुनौतियों से भरा हुआ होगा। नड्डा के सामने पहली प्राथमिकता दिल्ली में भाजपा को जीत की ओर अग्रसर करना होगा। क्योंकि पिछले चुनाव में दिल्ली से भाजपा को 3 सीटें ही हासिल हुई थी, लेकिन अब 33 सीट और पिछली 3 साटों को जीतकर ये दिखाना होगा कि, पार्टी अमित शाह पर ही निर्भर नहीं रह सकती। उन्हें नडडा के रूप में एक और शाह मिल गया है। आपको शायद स्मरण हो कि जब उत्तर प्रदेश में भाजपा ने एक तरफा जीत हासिल की थी वो दौर अमित शाह का था। उसके बाद वे केन्द्र में चले गये थे। ऐसे ही नडडा के सामने अपनी काबलियत साबित करने का अवसर और चुनौती दोनों है कि, वो दिल्ली के सिंहासन पर भाजपा को आसीन करें।

 

नडडा का संघर्ष यहीं नहीं खत्म होता बल्कि इसके बाद बंगाल, बिहार और असम जैसे राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं और ऐसा लगता है इन चुनावों में नड्डा को लोहे के चने चबाने पड़ सकते हैं। क्योंकि अब राजनीतिक हालात और हवा न तो भाजपा के पक्ष में है और न अब मोदी मैजिक ही चल रहा है। जहां सीएए और एनपीआर, एनआरसी ने देश की आवाम को दिखा दिया कि, भाजपा अपने घोषणा पत्र को दिखााकर आरएसएस का एजेन्डा आगे ला रही है, यही विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। पश्चिम बंगाल में जहां ममता बनर्जी भाजपा को कड़ी टक्कर देने वाली हैं वहीं सीएए, एनपीआर और एनआरसी को लेकर बिहार में भी मतभेद हैं। भले ही अमित शाह ने अपने भाषण में साफ कर दिया हो कि, बिहार में भाजपा नितीश कुमार के साथ चुनाव लडेगी लेकिन कार्यकर्ताओं के बीच सामंजस्य बिठाना और उन्हें संगठित करके चुनाव में उतारना और कामयाब चुनावी रणनीति बनाना भी नडडा के लिए चुनौती होगी। ऐसे में ये कहा जाये कि, नडडा के लिए एक तरफ कुंआ और एक तरफ खाई है तो शायद गलत नहीं होगा क्योंकि बिहार जीत गये तो सारा क्रेडिट नितीश को और हार गये तो हार का ठीकरा नडडा के सिर फूटना ही है।

बहरहाल, बंगाल में भी हालात कुछ अलग ही हैं वहां नडडा को अध्यक्ष होने के नाते नये सिरे से रणनीति बनाकर काम करना होगा। अभी हाल ही में बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष के बयान से सियासी तुफान उठ खड़ा हुआ है और असम में भी एनआरसी को लेकर पार्टी के ही लोग असंतुष्ट हैं। इसका विरोध वहां भी जमकर हो रहा है। अब आप सोच सकते हैं कि, ऐसे माहौल में नये साथी तलाशना और नये समीकरण बनाना नडडा के लिए चुनौती ही होगी। ऐसे बदलते सियासी माहौल के बीच भले ही भाजपा ने नडडा की नैया सियासी भंवर में उतार दी हो लेकिन इसमें जीत ही मायने रखती है। क्योंकि नडडा के कार्यकाल की परख इसी से होगी। यहीं से उनकी क्षमता को आंका जायेगा कि, सही मायनों में एक शाह के बाद दूसरा शाह भाजपा की कश्ती को पार लगाने वाला मौजूद है। वो भी तब जब न तो हवा भाजपा की न मैजिक मोदी का और न ही रणनीति शाह जैसी है।