SIR में 59 हजार आपत्तियों के बीच डुप्लीकेट वोटरों पर आयोग की नजर, एक शख्स ने अकेले दर्ज कराईं 5,906 आपत्तियां
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची की शुद्धता को लेकर सामने आए चौंकाने वाले आंकड़ों के बीच अब निर्वाचन विभाग ने डुप्लीकेट मतदाताओं की पहचान के लिए तकनीक का सहारा लेने की तैयारी शुरू कर दी है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने भारत निर्वाचन आयोग से डेमोग्राफिक सिमिलर एंट्रीज और फोटो सिमिलर एंट्रीज टूल उपलब्ध कराने की मांग की है।
इस तकनीक के जरिए एक ही व्यक्ति का नाम अलग-अलग बूथों, विधानसभा क्षेत्रों अथवा दूसरे राज्यों की मतदाता सूची में दर्ज होने जैसे संभावित मामलों की पहचान करने में मदद मिल सकेगी।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है, जब उत्तराखंड में SIR के दौरान 59,604 वास्तविक आपत्तियां दर्ज हुई हैं और इनमें बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता शामिल हैं, जो सत्यापन के दौरान अपने घर पर नहीं मिले या स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके बताए गए हैं।
सबसे हैरान करने वाला मामला किच्छा विधानसभा क्षेत्र से सामने आया है, जहां एक व्यक्ति राजेश तिवारी ने अकेले 5,906 आपत्तियां दर्ज कराईं।
डुप्लीकेट नामों की पहचान के लिए ECI से मांगा विशेष टूल
निर्वाचन विभाग के अनुसार, मतदाता सूची तैयार करने और उसके नियमित अपडेट के दौरान कई बार एक ही व्यक्ति का नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज रह जाता है।
यह स्थिति एक ही विधानसभा के अलग-अलग बूथों से लेकर दूसरी विधानसभा और दूसरे राज्यों तक हो सकती है। बड़ी मतदाता सूचियों में केवल नाम और सामान्य विवरण के आधार पर ऐसी प्रविष्टियों की पहचान करना आसान नहीं होता।
इसी को देखते हुए उत्तराखंड के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने भारत निर्वाचन आयोग से विशेष सॉफ्टवेयर टूल उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है।
डेमोग्राफिक सिमिलर एंट्रीज टूल मतदाताओं से जुड़ी समान जानकारियों के आधार पर संभावित डुप्लीकेट नामों को चिन्हित करने में मदद करेगा, जबकि फोटो सिमिलर एंट्रीज टूल तस्वीरों की समानता के आधार पर संदिग्ध प्रविष्टियों की पहचान कर सकेगा।
हालांकि, निर्वाचन विभाग ने साफ किया है कि केवल सॉफ्टवेयर में किसी प्रविष्टि के समान दिखाई देने पर मतदाता का नाम सीधे सूची से नहीं हटाया जाएगा।
पहले संबंधित मामले का सत्यापन होगा, मतदाता को नोटिस देकर उसका पक्ष सुना जाएगा और आवश्यक जांच तथा कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
ACEO विजय कुमार जोगदंडे ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग को टूल उपलब्ध कराने के लिए पत्र भेजा गया है। अनुमति और आवश्यक तकनीकी व्यवस्था मिलने के बाद ही उत्तराखंड में इसका इस्तेमाल शुरू किया जा सकेगा। राजनीतिक दलों को भी इस प्रस्तावित व्यवस्था की जानकारी दी गई है।
SIR में 40,906 मतदाता घर पर नहीं मिले या बताए गए शिफ्ट
उधर SIR के दौरान सामने आए आंकड़ों ने निर्वाचन विभाग के सामने सत्यापन की एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
प्रदेश में दर्ज 59,604 वास्तविक आपत्तियों में सबसे बड़ा हिस्सा उन मामलों का है, जिनमें मतदाता सत्यापन के दौरान अपने पते पर नहीं मिले या दूसरी जगह स्थायी रूप से शिफ्ट हो चुके बताए गए। ऐसे मामलों की संख्या 40,906 है, जो कुल आपत्तियों का करीब 69 प्रतिशत है।
इसके अलावा 14,358 आपत्तियां ऐसे मामलों में दर्ज की गई हैं, जहां संबंधित व्यक्ति के पहले से ही मतदाता के रूप में कहीं और नामांकित होने की बात कही गई है।
2,575 मामलों में स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट होने, 804 मामलों में मृत्यु, 143 में कम उम्र, 205 में भारतीय नागरिक नहीं होने और 607 मामलों में आपत्ति का कारण स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं किया गया है।
अब निर्वाचन विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह तय करना है कि घर पर नहीं मिलने वाला मतदाता वास्तव में स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुका है या सत्यापन के समय वह अस्थायी रूप से अनुपस्थित था।
किसी व्यक्ति के घर पर नहीं मिलने मात्र से उसका नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता। हर मामले में निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच और सुनवाई जरूरी होगी।
90 फीसदी से अधिक आपत्तियां मैदानी जिलों से
SIR के दौरान दर्ज आपत्तियों में 90 प्रतिशत से अधिक मामले मैदानी जिलों से सामने आए हैं। विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से किच्छा में 8,767, हल्द्वानी में 7,312, जसपुर में 6,720, काशीपुर में 5,704, रुद्रपुर में 4,958 और गदरपुर में 4,785 आपत्तियां दर्ज हुई हैं।
इसके अलावा झबरेड़ा में 2,333, सितारगंज में 1,612, बाजपुर में 1,475 और हरिद्वार ग्रामीण में 1,400 आपत्तियां दर्ज की गई हैं। आंकड़ों से साफ है कि मतदाता सूची की शुद्धता और सत्यापन को लेकर सबसे अधिक दबाव ऊधमसिंह नगर और हरिद्वार से जुड़े मैदानी क्षेत्रों में है।
एक व्यक्ति की 5,906 आपत्तियों ने बढ़ाए सवाल
किच्छा विधानसभा क्षेत्र में राजेश तिवारी द्वारा अकेले 5,906 आपत्तियां दर्ज कराए जाने का मामला भी राजनीतिक बहस का विषय बन गया है।
प्रदेश में दर्ज कुल 59,604 वास्तविक आपत्तियों में करीब दस प्रतिशत आपत्तियां अकेले इसी व्यक्ति की ओर से दर्ज की गई हैं।
कांग्रेस ने इस पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि बड़ी संख्या में विशेष समुदाय और कांग्रेस समर्थक माने जाने वाले मतदाताओं को निशाना बनाकर आपत्तियां दर्ज कराई जा रही हैं। कांग्रेस नेता अमेंद्र बिष्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज किया है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता मथुरा दत्त जोशी का कहना है कि कांग्रेस एक समाज विशेष को खुश करने के लिए SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, जबकि निर्वाचन आयोग अपने स्तर पर नियमों के तहत पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है।
राजेश तिवारी के बाद सबसे अधिक आपत्तियां दर्ज कराने वालों में किशोर कुमार ने 824, चंकित हुरिया ने 680 और अमित कुमार पांडे ने 440 आपत्तियां दर्ज कराईं। ऐसे में हजारों आपत्तियां सीमित संख्या में लोगों द्वारा दर्ज कराए जाने के बाद प्रत्येक आवेदन की वास्तविकता का सत्यापन निर्वाचन तंत्र के लिए अलग चुनौती बन गया है।
आपत्ति से सीधे नहीं हटेगा नाम, दोनों पक्षों को मिलेगा मौका
निर्वाचन विभाग ने स्पष्ट किया है कि किसी मतदाता के खिलाफ आपत्ति दर्ज होने का मतलब उसका नाम अपने आप मतदाता सूची से हट जाना नहीं है।
ACEO विजय कुमार जोगदंडे के अनुसार, आपत्ति दर्ज करने वाले और जिस मतदाता के खिलाफ आपत्ति की गई है, दोनों पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया जाता है। इसके बाद ही उपलब्ध तथ्यों और सत्यापन के आधार पर फैसला किया जाता है।
निर्वाचन विभाग के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर SIR के दौरान आई 59 हजार से अधिक आपत्तियों का निष्पक्ष और तथ्यात्मक सत्यापन करना है, वहीं दूसरी ओर तकनीक के जरिए अलग-अलग स्थानों और राज्यों में दर्ज संभावित डुप्लीकेट मतदाताओं की पहचान के लिए नई व्यवस्था विकसित करनी है।
कांग्रेस ने इस बात पर भी सवाल उठाया है कि SIR की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंचने के बाद अब डुप्लीकेसी रोकने के लिए विशेष सॉफ्टवेयर की जरूरत क्यों महसूस हुई। पार्टी ने निर्वाचन आयोग पर सरकार के दबाव में काम करने का आरोप लगाया है।
फिलहाल भारत निर्वाचन आयोग की अनुमति का इंतजार है। यदि उत्तराखंड को डेमोग्राफिक और फोटो सिमिलर एंट्रीज टूल इस्तेमाल करने की मंजूरी मिलती है, तो डुप्लीकेट प्रविष्टियों की पहचान और मतदाता सूची के सत्यापन में निर्वाचन विभाग को महत्वपूर्ण तकनीकी मदद मिल सकती है।
लेकिन अंतिम कसौटी यही होगी कि तकनीक से चिन्हित हर संदिग्ध प्रविष्टि का निष्पक्ष सत्यापन हो और किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के सूची से न हटे।

