बिग ब्रेकिंग: मदरसों के नए मानकों पर हाईकोर्ट में घमासान, सरकार ने मांगा समय। याचिकाकर्ता की दो टूक मांग

मदरसों के नए मानकों पर हाईकोर्ट में घमासान, सरकार ने मांगा समय। याचिकाकर्ता की दो टूक मांग

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय में मदरसों और स्कूलों से जुड़े उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम के प्रावधानों और नए मानकों को चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को सुनवाई हुई।

राज्य सरकार ने मामले में जवाब दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा, जिस पर याचिकाकर्ता ने आपत्ति नहीं जताई, लेकिन इस दौरान अब तक न्यायालय में दाखिल नहीं किए गए सभी दस्तावेज और जवाब प्रस्तुत करने की मांग की।

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 1 सितंबर के लिए निर्धारित की है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल ने बताया कि एडवोकेट जनरल की ओर से एक आवेदन प्रस्तुत किया गया है। इसमें मामले की सुनवाई के लिए कुछ और समय देने और इसे दो-तीन सप्ताह बाद सूचीबद्ध करने का अनुरोध किया गया है।

वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अहमद शमशाद ने सरकार की ओर से समय मांगने पर आपत्ति नहीं की।

हालांकि उन्होंने कहा कि यदि मामले को दो-तीन सप्ताह बाद सुना जाना है तो इस अवधि में वे सभी दस्तावेज और जवाब न्यायालय के समक्ष दाखिल किए जाएं, जो अभी तक प्रस्तुत नहीं किए गए हैं।

मदरसों ने नए मानकों को दी है चुनौती

मामले के अनुसार, अलग-अलग मदरसा संचालकों ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम के उन प्रावधानों को चुनौती दी है, जिनके तहत मदरसों और स्कूलों के लिए नए शिक्षा संबंधी मानक लागू किए गए हैं।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि कम समय में नए मानकों को पूरा करना मदरसों के लिए मुश्किल है। यदि निर्धारित समय में इन मानकों को पूरा नहीं किया गया तो आने वाले शैक्षणिक सत्र में कई मदरसों के बंद होने की स्थिति पैदा हो सकती है।

इसी मामले में ऊधमसिंह नगर की केबीएन सोसाइटी की याचिका को भी क्लब किया गया है। सोसाइटी का कहना है कि उसके संस्थानों में वर्ष 2006 से मदरसे संचालित किए जा रहे हैं। यहां धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा भी दी जाती है और संस्थानों को उत्तराखंड सरकार से मान्यता प्राप्त है।

याचिका के मुताबिक इन संस्थानों में करीब 550 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यदि नए मानकों को पूरा न कर पाने के कारण संस्थान बंद होते हैं तो इसका सीधा असर इन विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ सकता है।

अनुच्छेद 30 के मौलिक अधिकार का भी दिया हवाला

याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 30 का भी हवाला दिया है। इसमें धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए प्रावधानों और मानकों को लागू करने में इस संवैधानिक अधिकार के पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

पांच लाख रुपये तक जुर्माने के प्रावधान को भी चुनौती

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह भी बताया गया कि नए संशोधन के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं करने पर पांच लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

इस प्रावधान को भी नई रिट याचिका संख्या 599/2026 के माध्यम से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 1 सितंबर को होगी। तब तक राज्य सरकार की ओर से मांगे गए अतिरिक्त समय के दौरान लंबित दस्तावेज और जवाब दाखिल किए जाने की उम्मीद है।