विशेष रिपोर्ट: बारिश में बेहाल पहाड़। तमकनाला में जल सैलाब, पौड़ी में बहा पुल और टिहरी में सड़क का इंतजार

बारिश में बेहाल पहाड़। तमकनाला में जल सैलाब, पौड़ी में बहा पुल और टिहरी में सड़क का इंतजार

देहरादून। उत्तराखंड में लगातार हो रही बारिश के बीच पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं और बदहाल कनेक्टिविटी की तस्वीरें सामने आ रही हैं। चमोली की नीती घाटी में तमकनाला का जलप्रवाह बैली ब्रिज को बहा ले गया, जबकि पौड़ी में एक साल पहले बहा पुल अब तक नहीं बन पाया है।

टिहरी के काणीगाढ़ गांव के ग्रामीण आज भी सड़क के इंतजार में 4 से 5 किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं। वहीं पिथौरागढ़ के हीपा गांव में सड़क नहीं होने के कारण बुजुर्गों को बीमार महिला को कंधों पर उठाकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा।

तमकनाला में जल सैलाब से बहा बैली ब्रिज, अस्थायी मार्ग से आवाजाही बहाल

चमोली की नीती घाटी में सोमवार शाम तमकनाला में अचानक आए तेज जलप्रवाह और मलबे ने भारी तबाही मचाई। ज्योतिर्मठ-मलारी मोटर मार्ग पर बना बैली ब्रिज पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे सीमांत क्षेत्र की आवाजाही बाधित हो गई। घटना के बाद बीआरओ और प्रशासन की टीमों ने युद्धस्तर पर काम शुरू किया।

मंगलवार देर शाम तमकनाला में ह्यूम पाइप डालकर अस्थायी मोटर मार्ग तैयार किया गया, जिसके बाद वाहनों की आवाजाही बहाल हो गई। इससे नीती घाटी के ग्रामीणों, सीमांत क्षेत्र में तैनात जवानों और आवश्यक सेवाओं से जुड़े लोगों को राहत मिली है।

हालांकि, इस घटना के बाद एक व्यक्ति के लापता होने की सूचना है। जिला प्रशासन, पुलिस, सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और बीआरओ की टीमें संयुक्त रूप से सर्च ऑपरेशन चला रही हैं।

सैलाब के बीच पोकलेन ऑपरेटर ने दिखाई सूझबूझ, मशीन के अंदर बैठकर बचाई जान

तमकनाला में आए सैलाब के दौरान पोकलेन मशीन भी तेज बहाव में फंस गई थी। उस समय मशीन को जोगिंदर सिंह चला रहे थे। चारों तरफ पानी, बोल्डर और मलबा होने के बावजूद उन्होंने घबराने के बजाय मशीन के अंदर ही रहकर उसे सुरक्षित दिशा में निकालने की कोशिश की।

जोगिंदर सिंह के मुताबिक, यदि वह मशीन से बाहर कूदते तो तेज बहाव में बह सकते थे। उन्होंने करीब डेढ़ मिनट तक मशीन के अंदर रहकर स्थिति को संभाला और सुरक्षित निकलने में कामयाब रहे। उनकी सूझबूझ के कारण पोकलेन मशीन भी सुरक्षित बच गई, जो अब राहत और सड़क बहाली के काम में इस्तेमाल की जा रही है।

तमकनाला आपदा की होगी वैज्ञानिक जांच, सात संस्थानों को जिम्मेदारी

तमकनाला में अचानक इतना पानी और मलबा कहां से आया, अब इसकी वैज्ञानिक जांच होगी। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने देश के सात प्रमुख वैज्ञानिक एवं तकनीकी संस्थानों को अध्ययन की जिम्मेदारी सौंपी है।

जांच में वाडिया हिमालयी भू-विज्ञान संस्थान, एनआरएससी, आईआईआरएस, यूएसएसी, जीएसआई, आईएमडी और एनआईएच शामिल हैं। वैज्ञानिक यह पता लगाएंगे कि जलप्रवाह सामान्य बारिश, अत्यधिक स्थानीय बारिश, बादल फटने, भूस्खलन, ग्लेशियर या किसी अन्य प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण बढ़ा था।

सैटेलाइट इमेजरी, ड्रोन सर्वे, रिमोट सेंसिंग और जीआईएस आधारित अध्ययन से घटना से पहले और बाद की स्थिति का भी विश्लेषण किया जाएगा। साथ ही मलबे के स्रोत, ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र, भूस्खलन और संभावित ग्लेशियर या प्राकृतिक जलस्रोतों की भूमिका का अध्ययन होगा।

संस्थानों को 15 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है। भविष्य में यहां अर्ली वार्निंग सिस्टम और रियल टाइम मॉनिटरिंग की जरूरत का भी आकलन किया जाएगा।

वैज्ञानिकों ने बताया संवेदनशील है तमक क्षेत्र

वाडिया हिमालयी भू-विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. मनीष मेहता के अनुसार तमक क्षेत्र मोरेन मटेरियल से बना है और यह इलाका पहले ग्लेशियरों की गतिविधियों से प्रभावित रहा है। उनके मुताबिक तमकनाला में पहले भी फ्लैश फ्लड की घटनाएं होती रही हैं।

उन्होंने क्षेत्र की संकरी घाटी, ढलानों, ग्लेशियरों, मोरेनिक मलबे, लैंडस्लाइड और बदलते बारिश चक्र को अचानक आने वाले जलप्रवाह से जोड़ते हुए क्षेत्र को संवेदनशील बताया है।

सीएम धामी ने की मॉनिटरिंग, राहत सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने तमकनाला घटना के बाद जिलाधिकारी चमोली और गढ़वाल मंडल आयुक्त से स्थिति की जानकारी ली। उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राशन, खाद्य सामग्री, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित न होने देने के निर्देश दिए।

सीएम ने कनेक्टिविटी जल्द बहाल करने के साथ संवेदनशील नदी-नालों और निचले इलाकों में विशेष सतर्कता बरतने को कहा है। राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र से भी प्रदेश के संवेदनशील क्षेत्रों पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

पौड़ी में एक साल से पुल का इंतजार, उफनती नदी पार कर स्कूल जा रहे बच्चे

चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र के गवाणी गांव में अगस्त 2025 में भारी बारिश के दौरान बहा पुल एक साल बाद भी नहीं बन पाया है। ड्वीला मल्ला, ड्वीला तल्ला, देगला और तिमलपट समेत आसपास के गांवों को जोड़ने वाला यह पुल अब भी ग्रामीणों के लिए बड़ी समस्या बना हुआ है।

सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को हो रही है। उन्हें स्कूल जाने के लिए उफनती मछलाड नदी पार करनी पड़ती है। दूसरा रास्ता घने जंगल से होकर जाता है, जिससे दूरी करीब पांच किलोमीटर हो जाती है और जंगली जानवरों का खतरा भी बना रहता है।

ग्रामीणों ने जल्द पुल निर्माण की मांग की है। जिलाधिकारी पौड़ी स्वाति एस भदौरिया ने कहा है कि बारिश से क्षतिग्रस्त पुलों और रास्तों की रिपोर्ट के आधार पर आवश्यक कार्रवाई और धनराशि स्वीकृत की जा रही है।

हीपा गांव में सड़क नहीं, बुजुर्गों ने मरीज को कंधे पर पहुंचाया अस्पताल

पिथौरागढ़ के बेरीनाग विकासखंड स्थित दूरस्थ हीपा गांव में सड़क सुविधा का अभाव आज भी ग्रामीणों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। 72 वर्षीय प्रतिमा देवी की तबीयत खराब होने पर गांव के 55 से 62 वर्ष तक के बुजुर्गों को उन्हें डोली के सहारे कंधों पर उठाकर अस्पताल पहुंचाना पड़ा।

ग्रामीणों का कहना है कि गांव में सड़क नहीं होने और युवाओं के रोजगार के लिए बाहर रहने के कारण आपात स्थिति में बुजुर्गों को ही मरीजों को उठाकर ले जाना पड़ता है।

क्षेत्रीय विधायक फकीर राम टम्टा और पीएमजीएसवाई के अधिकारियों के मुताबिक गांव के लिए सड़क स्वीकृत हो चुकी है और निर्माण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है।

टिहरी का काणीगाढ़ गांव भी सड़क के इंतजार में, चुनाव बहिष्कार की चेतावनी

धनौल्टी विधानसभा क्षेत्र के ग्राम सभा बनाली के काणीगाढ़ गांव में ग्रामीणों को सड़क सुविधा के लिए 4 से 5 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। राशन और गैस सिलेंडर से लेकर रोजमर्रा का सामान तक ग्रामीण कंधों पर उठाकर गांव पहुंचाते हैं।

बीमारी की स्थिति में मरीजों को डंडी-कंडी के सहारे मुख्य सड़क तक पहुंचाना पड़ता है। बरसात में रास्ते में पड़ने वाले गधेरे उफान पर आने से परेशानी और बढ़ जाती है। स्कूली बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी सड़क का अभाव गंभीर समस्या बना हुआ है।

ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से सड़क की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक जमीन पर काम नहीं हुआ। नाराज ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि सड़क निर्माण को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आगामी विधानसभा चुनाव में चुनाव बहिष्कार किया जा सकता है।

एडीएम शैलेंद्र सिंह नेगी ने मामले को दिखाने और सड़क निर्माण में हो रही देरी के कारणों की जांच कराने की बात कही है।

बढ़ते जलस्तर को लेकर पौड़ी में अलर्ट, गंगा-अलकनंदा के घाटों पर पुलिस की निगरानी

लगातार बारिश के बीच अलकनंदा और गंगा के जलस्तर में बढ़ोतरी को देखते हुए पौड़ी जिला प्रशासन और पुलिस भी अलर्ट मोड पर हैं। श्रीनगर गढ़वाल और लक्ष्मणझूला क्षेत्र में घाटों पर पुलिस की गश्त बढ़ा दी गई है।

लाउडस्पीकर के जरिए लोगों और पर्यटकों को नदी से दूर रहने की चेतावनी दी जा रही है। पुलिस ने लोगों से नदी में उतरने, तेज बहाव के बीच सेल्फी लेने और बच्चों को नदी किनारे अकेले भेजने से बचने की अपील की है।

एक तरफ आपदा का खतरा, दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं का संकट

तमकनाला की घटना ने जहां हिमालयी क्षेत्रों में बदलते प्राकृतिक खतरे और सीमांत इलाकों की संवेदनशीलता को उजागर किया है।

वहीं पौड़ी, पिथौरागढ़ और टिहरी की तस्वीरें यह सवाल भी खड़ा करती हैं कि प्राकृतिक आपदा के बीच उन गांवों की सुरक्षा और कनेक्टिविटी कैसे सुनिश्चित होगी, जहां आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं।

तमकनाला की वैज्ञानिक जांच से भविष्य के खतरों को समझने में मदद मिलने की उम्मीद है, लेकिन पहाड़ के दूरस्थ गांवों में सड़क और पुल निर्माण की धीमी रफ्तार भी सरकार और प्रशासन के सामने उतनी ही बड़ी चुनौती बनी हुई है।