उत्तराखंड में दरिंदों पर अदालत का शिकंजा। मामा को 20 साल की सजा, रेप-हत्या का दोषी भी करार
देहरादून। उत्तराखंड में महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ जघन्य अपराधों के दो चर्चित मामलों में अदालतों ने सख्त रुख अपनाते हुए दोषियों को कानून के कठघरे तक पहुंचाया है।
बागेश्वर की विशेष पोक्सो अदालत ने अपनी 17 वर्षीय नाबालिग भांजी से दुष्कर्म के दोषी सगे मामा को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
वहीं, देहरादून में तीन साल पहले हुए सनसनीखेज दुष्कर्म एवं हत्या मामले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी राजेश को बलात्कार, हत्या और साक्ष्य मिटाने का दोषी करार दिया है।
बागेश्वर के मामले में अदालत ने वैज्ञानिक साक्ष्यों, पीड़िता के बयान और डीएनए रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 376(2) और पोक्सो अधिनियम की धारा 5/6 के तहत दोषी माना।
वर्ष 2024 में पेट दर्द की जांच के दौरान नाबालिग के गर्भवती होने का खुलासा हुआ था। बाद में पीड़िता ने अपने सगे मामा पर दुष्कर्म का आरोप लगाया। एफएसएल की डीएनए रिपोर्ट में आरोपी को भ्रूण का जैविक पिता पाया गया। अदालत ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को पीड़िता को पांच लाख रुपये का प्रतिकर दिलाने के भी निर्देश दिए।
वहीं, देहरादून के बहुचर्चित दुष्कर्म एवं हत्या मामले में विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट ने वैज्ञानिक साक्ष्यों को निर्णायक मानते हुए आरोपी राजेश को दोषी करार दिया। जुलाई 2023 में हाथीबड़कला क्षेत्र में एक अज्ञात महिला का शव बरामद हुआ था।
जांच के दौरान सीसीटीवी फुटेज, डीएनए रिपोर्ट और मृतका के शरीर पर मिले दांतों के निशानों का मिलान आरोपी से हुआ, जिससे अभियोजन पक्ष के आरोप संदेह से परे साबित हुए।
दोनों मामलों में अदालतों ने स्पष्ट संदेश दिया कि महिलाओं और नाबालिगों के खिलाफ जघन्य अपराधों में वैज्ञानिक साक्ष्य अपराधियों को सजा दिलाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
न्यायालयों ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषियों के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी बरतने से इनकार किया और कड़ी सजा सुनाते हुए पीड़ितों को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण फैसला दिया।

