हाईकोर्ट के दो बड़े फैसले। बेदखली के नियम तय, कर्मचारी मुआवजे पर भी महत्वपूर्ण फैसला
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने शुक्रवार को दो अलग-अलग मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाते हुए बेदखली की कानूनी प्रक्रिया और कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 के दायरे को स्पष्ट किया।
एक मामले में कोर्ट ने कहा कि रेलवे की जमीन पर कथित अवैध कब्जा होने की स्थिति में भी संबंधित व्यक्ति को केवल प्रशासनिक नोटिस देकर नहीं हटाया जा सकता, जबकि दूसरे मामले में स्पष्ट किया कि कर्मचारी की मृत्यु पर मुआवजा देने की जिम्मेदारी केवल उसके नियोक्ता की होगी, किसी तीसरे पक्ष की नहीं।
पहले मामले में वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने मसूरी के झड़ीपानी क्षेत्र में रेलवे द्वारा जारी बेदखली नोटिस को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को अचल संपत्ति से बिना विधिक प्रक्रिया अपनाए जबरन बेदखल करना संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि भले ही कब्जा अवैध क्यों न हो, संबंधित व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए और सक्षम न्यायालय के आदेश के बाद ही बेदखली की कार्रवाई की जा सकती है।
कोर्ट ने कहा कि रेलवे द्वारा 5 अक्टूबर 2023 को जारी सामान्य प्रशासनिक नोटिस कानून की दृष्टि में वैध नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि रेलवे कानून के अनुरूप उचित प्रक्रिया अपनाकर अवैध कब्जाधारियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।
वहीं दूसरे मामले में न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी की एकलपीठ ने ‘कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923‘ की व्याख्या करते हुए कहा कि इस कानून के तहत मुआवजा देने की जिम्मेदारी केवल कर्मचारी के नियोक्ता की होती है।
अदालत ने यह फैसला उत्तराखंड पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीसीएल) की उस अपील पर दिया, जिसमें कर्मचारी मुआवजा आयुक्त द्वारा बिजली विभाग को मुआवजा देने के आदेश को चुनौती दी गई थी।
मामला वर्ष 2012 में अगस्त्यमुनि स्थित वन विभाग के फॉरेस्ट गेस्ट हाउस में कार्यरत चौकीदार दिनेश प्रसाद डिमरी की करंट लगने से हुई मौत से जुड़ा था। कर्मचारी मुआवजा आयुक्त ने बिजली विभाग की कथित लापरवाही मानते हुए यूपीसीएल को 4.15 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि मृतक वन विभाग का कर्मचारी था, इसलिए कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत मुआवजा देने की जिम्मेदारी भी उसी के नियोक्ता यानी वन विभाग की होगी।
अदालत ने यूपीसीएल की अपील स्वीकार करते हुए आयुक्त के आदेश में संशोधन किया और निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि ब्याज सहित डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर की ओर से अदा की जाए।
इन दोनों फैसलों के माध्यम से हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई में विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है और कर्मचारी मुआवजा अधिनियम के तहत दायित्व केवल नियोक्ता तक ही सीमित रहता है।


