हाईकोर्ट ब्रेकिंग: बेलबाबा प्रस्ताव नामंजूर, IPS प्रतिनियुक्ति और राम विलास यादव केस में सुनवाई

बेलबाबा प्रस्ताव नामंजूर, IPS प्रतिनियुक्ति और राम विलास यादव केस में सुनवाई

नैनीताल। उत्तराखंड में न्यायिक और प्रशासनिक मामलों को लेकर हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आए हैं। हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में उत्तराखंड हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने के प्रस्ताव को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने खारिज कर दिया है।

वहीं, आईपीएस अधिकारियों नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी की केंद्र में प्रतिनियुक्ति से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने सुनवाई जारी रखते हुए दोनों पक्षों को संबंधित नियमों का अध्ययन करने को कहा है।

इसके अलावा, आय से अधिक संपत्ति के मामले में पूर्व अपर सचिव राम विलास यादव की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने सरकार से जांच की प्रगति की जानकारी मांगी है।

बेलबाबा में हाईकोर्ट शिफ्ट करने के प्रस्ताव को झटका

उत्तराखंड हाईकोर्ट को नैनीताल से हल्द्वानी के बेलबाबा क्षेत्र में स्थानांतरित करने की तैयारियों को वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति के फैसले से झटका लगा है।

समिति ने तराई केंद्रीय वन प्रभाग क्षेत्र में हाईकोर्ट परिसर बनाने के प्रस्ताव को वन संरक्षण एवं संवर्द्धन नियम, 2023 के प्रावधानों के तहत नामंजूर कर दिया है।

हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने के लिए 30 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि की मांग की गई थी। प्रस्तावित निर्माण के लिए 123 पेड़ों को काटने की आवश्यकता बताई गई थी।

समिति ने पाया कि प्रस्ताव में वन भूमि के बजाय गैर-वन भूमि के विकल्पों का नियमों के अनुरूप पर्याप्त परीक्षण नहीं किया गया है। जिला प्रशासन की ओर से गैर-वन भूमि उपलब्ध नहीं होने संबंधी प्रमाण पत्र दिए जाने पर भी समिति ने आपत्ति जताई।

इस संबंध में नैनीताल के जिलाधिकारी ने बेलबाबा क्षेत्र में हाईकोर्ट स्थानांतरित करने का प्रस्ताव शासन को भेजा था। इसके खिलाफ अधिवक्ता कौशल साह जगाती ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय में शिकायत की थी।

उन्होंने हाईकोर्ट में भी याचिका दायर की थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। अब पर्यावरण मंत्रालय की क्षेत्रीय अधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट अधिवक्ता कौशल साह जगाती और अधिवक्ता कार्तिकेय हरि गुप्ता को मिली है। हालांकि, रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।

बैठक के दौरान हाईकोर्ट के प्रतिनिधि ने बताया था कि मौजूदा परिसर में मुकदमों और कर्मचारियों की संख्या बढ़ने के कारण जगह की कमी हो रही है। वर्ष 2010 में लंबित वादों की संख्या लगभग 4,000 थी, जो अब बढ़कर 64,000 से अधिक हो गई है।

नैनीताल के प्रमुख पर्यटन स्थल होने के कारण वादकारियों को महंगे होटलों में ठहरने की समस्या और शहर में यातायात के बढ़ते दबाव का भी हवाला दिया गया था।

समिति इससे पहले गौलापार में लगभग 4,238 पेड़ों के कटान और आवासीय भवन निर्माण से जुड़े प्रस्ताव को भी 24 जनवरी 2024 को खारिज कर चुकी है। नए प्रस्ताव को नामंजूर किए जाने से हाईकोर्ट को हल्द्वानी स्थानांतरित करने की योजना के सामने एक और बाधा खड़ी हो गई है।

नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी की प्रतिनियुक्ति पर सुनवाई जारी

उत्तराखंड में आईजी स्तर पर तैनात आईपीएस अधिकारियों नीरू गर्ग और अरुण मोहन जोशी को केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन डीआईजी पदों पर प्रतिनियुक्ति पर भेजने के आदेशों को चुनौती देने वाले मामले में हाईकोर्ट ने सुनवाई जारी रखी है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने दोनों पक्षों को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के निर्णय और संबंधित स्थानांतरण नियमावली का अध्ययन करने को कहा है। मामले में अगली सुनवाई अगले दिन भी जारी रहने की बात कही गई है।

मामले के अनुसार, वर्ष 2005 बैच की आईपीएस अधिकारी नीरू गर्ग को गृह मंत्रालय के अधीन भारत-तिब्बत सीमा पुलिस में उप महानिरीक्षक (डीआईजी) और वर्ष 2006 बैच के आईपीएस अधिकारी अरुण मोहन जोशी को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में डीआईजी पद पर प्रतिनियुक्ति दी गई है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 5 मार्च 2026 को इस संबंध में आदेश जारी किए थे। इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने 6 मार्च 2026 को दोनों अधिकारियों को कार्यमुक्त करने के आदेश जारी किए।

अधिकारियों ने इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी। इससे पहले मामला केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण को भेजा गया था, जिसके निर्णय के खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर कीं।

सरकार की ओर से दलील दी गई कि संबंधित अधिकारी केंद्र सरकार के अधीन प्रतिनियुक्ति पर भेजे जा सकते हैं।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से सवाल किया कि इस रैंक के अधिकारियों के लिए कितने पद प्रतिनियुक्ति के आधार पर भरे जाने हैं और कितने पद स्थायी रूप से राज्य सरकार के अधीन हैं।

जवाब में बताया गया कि ऐसे 16 पद हैं, जिन पर प्रतिनियुक्ति के आधार पर अधिकारियों को केंद्र में भेजा जा सकता है, जबकि शेष पद राज्य सरकार के अधीन हैं। अदालत ने दोनों पक्षों को संबंधित नियमों और कैट के निर्णय का अध्ययन कर अपना पक्ष रखने को कहा है।

राम विलास यादव की याचिका पर सरकार से जांच की प्रगति मांगी

आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोपी उत्तराखंड के पूर्व अपर सचिव राम विलास यादव की याचिका पर भी हाईकोर्ट में सुनवाई हुई।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई जारी रखते हुए अगली तारीख 29 अक्टूबर निर्धारित की है। अदालत ने राज्य सरकार को तब तक जांच की प्रगति से अवगत कराने के निर्देश दिए हैं।

राम विलास यादव उत्तराखंड सरकार के समाज कल्याण विभाग में अपर सचिव के पद पर कार्यरत रहे हैं। इससे पहले वह उत्तर प्रदेश सरकार में लखनऊ विकास प्राधिकरण के सचिव भी रह चुके हैं।

उनके खिलाफ लखनऊ में आय से अधिक संपत्ति रखने की शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके आधार पर उत्तराखंड सरकार ने जांच शुरू की थी।

जांच के दौरान विजिलेंस टीम ने लखनऊ, देहरादून और गाजीपुर स्थित ठिकानों पर छापेमारी की थी। जांच में कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति से संबंधित दस्तावेज मिलने की बात सामने आई थी।

संपत्ति का कुछ हिस्सा उनकी पत्नी के नाम पर होने की जानकारी भी जांच में सामने आई। इसके बाद उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया। इस कार्रवाई को निरस्त करने की मांग को लेकर राम विलास यादव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।

अब अदालत ने राज्य सरकार से जांच की वर्तमान स्थिति बताने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर को होगी।