हाईकोर्ट का डबल रुख। किसान आत्महत्या केस में रिपोर्ट तलब, मनरेगा विवाद में वैधानिक रास्ता सुझाया
नैनीताल। हाईकोर्ट में बुधवार को दो अलग-अलग मामलों पर सुनवाई के दौरान अदालत का अलग-अलग रुख देखने को मिला। एक ओर काशीपुर के किसान आत्महत्या मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार से जांच की प्रगति रिपोर्ट तलब की।
वहीं दूसरी ओर देहरादून के कालसी ब्लॉक के खाती गांव में मनरेगा अनियमितताओं से जुड़े मामले में याचिका निस्तारित करते हुए वैधानिक उपाय अपनाने के निर्देश दिए।
किसान आत्महत्या मामला: गिरफ्तारी पर रोक बरकरार, रिपोर्ट तलब
काशीपुर निवासी किसान सुखवंत सिंह आत्महत्या प्रकरण में नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी पर रोक को नैनीताल हाईकोर्ट ने आगे बढ़ा दिया है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने राज्य सरकार से मामले की जांच की अब तक की प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि मामले में चार्जशीट तैयार हो चुकी है और 12 लोग नामजद हैं। इस पर कोर्ट ने अतिरिक्त शपथ पत्र दाखिल करने के निर्देश दिए।
वहीं, याचिकाकर्ताओं को भी सरकार के शपथ पत्र पर जवाब दाखिल करने को कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल को तय की गई है।
इससे पहले कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को जांच में सहयोग करने के निर्देश देते हुए गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक दी थी। सरकार ने बताया कि अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है और मामले की निगरानी पुलिस महानिदेशक स्तर से की जा रही है। जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है।
गौरतलब है कि जनवरी में हल्द्वानी के काठगोदाम स्थित एक होटल में किसान सुखवंत सिंह ने आत्महत्या कर ली थी।
आत्महत्या से पहले उन्होंने फेसबुक लाइव के जरिए कई लोगों और पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। मृतक के भाई की तहरीर पर 26 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था।
मनरेगा मामला: याचिका निस्तारित, पंचायत एक्ट का रास्ता
देहरादून जिले के कालसी विकासखंड के खाती गांव में मनरेगा कार्यों में अनियमितताओं के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी शिकायत राज्य पंचायती राज अधिनियम की धारा 91 के तहत संबंधित प्राधिकरण के समक्ष दर्ज कराएं।
याचिका में आरोप लगाया गया था कि ग्राम प्रधान ने मनरेगा के तहत मिलने वाले रोजगार का लाभ वास्तविक मजदूरों को न देकर अपने परिचितों और रिश्तेदारों को पहुंचाया। साथ ही फर्जी मस्टरोल के जरिए भुगतान कराने का भी आरोप लगाया गया।
कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मामलों में पहले वैधानिक प्रक्रिया के तहत ही शिकायत दर्ज कराना उचित होगा।
दो मामलों में अलग रुख
इन दोनों मामलों में हाईकोर्ट का अलग-अलग रुख साफ नजर आया। एक ओर गंभीर आपराधिक मामले में कोर्ट ने जांच की निगरानी जारी रखते हुए सरकार से जवाब मांगा, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक अनियमितताओं के मामले में वैधानिक प्रक्रिया अपनाने पर जोर दिया।
यह आदेश न्यायिक संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है, जहां अदालत ने जरूरत के अनुसार हस्तक्षेप और प्रक्रिया दोनों का संतुलन बनाए।



