बिंदाल-रिस्पना प्रोजेक्ट पर हाईकोर्ट सख्त, सेवानिवृत्त कर्मचारी को राहत के निर्देश
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को बिंदाल-रिस्पना फोर लेन एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले से जुड़ी पूर्व में दायर दो अन्य जनहित याचिकाओं को भी साथ में सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं।
कोर्ट ने अगली सुनवाई के लिए 15 अप्रैल की तिथि तय की है। देहरादून निवासी अनूप नौटियाल द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि शहर को जाम मुक्त करने के उद्देश्य से प्रस्तावित इस परियोजना के तहत बड़े स्तर पर भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है, जिससे कई लोगों के घर और आजीविका प्रभावित होगी।
याचिकाकर्ता ने यह भी आशंका जताई है कि इतने बड़े निर्माण कार्य से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह पर असर पड़ेगा और क्षेत्र की भौगोलिक क्षमता पर दबाव बढ़ सकता है।
याचिका में मांग की गई है कि यदि परियोजना बनाई जाती है तो अंतरराष्ट्रीय मानकों और स्थानीय हितों को ध्यान में रखते हुए ही इसे आगे बढ़ाया जाए।
वहीं राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि फिलहाल प्रोजेक्ट का रोडमैप तैयार किया गया है और इससे संबंधित मामले पहले से न्यायालय में लंबित हैं।
इसी दिन एक अन्य मामले में हाईकोर्ट ने तराई बीज विकास निगम से सेवानिवृत्त कंपनी सचिव राजेश कुमार निगम की याचिका का निस्तारण करते हुए उनके बकाया भुगतान को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता दो सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करें, जिसके बाद संबंधित प्राधिकारी को छह सप्ताह के भीतर उस पर निर्णय लेना होगा।
याचिकाकर्ता वर्ष 2017 में सेवानिवृत्त हुए थे और उन्होंने ग्रेच्युटी की शेष राशि, 18 प्रतिशत ब्याज और एसीपी के बकाया भुगतान की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान निगम की ओर से बताया गया कि उन्हें 10 लाख रुपये ग्रेच्युटी के रूप में जारी किए जा चुके हैं, जो निर्धारित अधिकतम सीमा है, जबकि एसीपी लाभ के संबंध में बोर्ड स्तर पर निर्णय लिया जा चुका है और जल्द भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के वैध देयकों का समय पर भुगतान सुनिश्चित करना आवश्यक है और इसमें अनावश्यक देरी स्वीकार्य नहीं है।




