हाईकोर्ट के चार बड़े फैसले। पेड़ कटान पर रोक, लोकायुक्त पर जवाब तलब, भर्ती व नगर व्यवस्थाओं पर बड़े निर्देश
नैनीताल। उत्तराखंड से जुड़े विभिन्न जनहित मामलों पर सुनवाई करते हुए नैनीताल हाईकोर्ट ने एक ही दिन में कई अहम आदेश जारी किए हैं।
अदालत ने पर्यावरण संरक्षण, लोकायुक्त की नियुक्ति, शहरी व्यवस्थाओं और भर्ती प्रक्रिया को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार और स्थानीय निकायों की जवाबदेही तय की है।
मसूरी स्थित एमपीजी कॉलेज मसूरी की भूमि पर सड़क निर्माण और खेल मैदान विकसित करने के लिए बांज (ओक) के पेड़ों की कटाई के मामले में कोर्ट ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
अदालत ने नगर पालिका, राज्य सरकार और वन विभाग से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट हुआ कि पेड़ कटान के लिए वन विभाग से आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी। कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए पूछा कि बिना अनुमति यह कार्रवाई किस आधार पर की गई।
वहीं, राज्य में लंबे समय से लंबित लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर भी अदालत ने सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि 3 अप्रैल को प्रस्तावित सर्च कमेटी की बैठक में लिए गए निर्णय को 8 अप्रैल तक शपथ पत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए।
अदालत ने यह भी याद दिलाया कि पूर्व में सरकार को नियुक्ति के लिए पर्याप्त समय दिया जा चुका है, इसके बावजूद प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई, जो गंभीर विषय है।
नैनीताल शहर की व्यवस्थाओं से जुड़े मामले में अदालत ने नगर पालिका को राहत देते हुए बरापत्थर, फांसी का गधेरा और लेक ब्रिज चुंगी को ठेके पर संचालित करने की अनुमति दे दी है।
साथ ही एसएसपी नैनीताल से यह भी पूछा गया है कि टैक्सी बाइक संचालन पर लगाए गए प्रतिबंध का कितना अनुपालन हुआ है। नगर पालिका ने संसाधनों और कर्मचारियों की कमी का हवाला देते हुए स्वयं संचालन में असमर्थता जताई थी।
ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क निर्माण से जुड़े एक अन्य मामले में कोर्ट ने राज्य सरकार और मंडी परिषद को निर्देश दिए हैं कि वे दो सप्ताह के भीतर अपनी स्थिति स्पष्ट करें। यह मामला रामगढ़ से मुक्तेश्वर और गोमतीगैर से भटेलिया मार्ग के निर्माण से संबंधित है।
इसके अलावा ड्राफ्ट्समैन भर्ती प्रक्रिया पर भी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। अदालत ने एकल पीठ के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें केवल ड्राफ्ट्समैन ट्रेड के अभ्यर्थियों को ही पात्र माना गया था।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सिविल इंजीनियरिंग और आर्किटेक्चरल असिस्टेंटशिप जैसे संबंधित डिप्लोमा धारक भी इस पद के लिए योग्य हैं।
कोर्ट ने कहा कि योग्यता निर्धारित करना नियोक्ता का अधिकार है और जब तक उसमें कोई मनमानी या नियमों का उल्लंघन न हो, तब तक न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
इन सभी मामलों में दिए गए निर्देशों से स्पष्ट है कि हाईकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण, प्रशासनिक पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही को लेकर सख्त संदेश दिया है।




