हाईकोर्ट के दो बड़े फैसले। POCSO केस में आरोपी बरी, गिरफ्तारी नियमों पर स्पष्टता
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग मामलों में अहम फैसले सुनाते हुए आपराधिक न्याय प्रणाली में साक्ष्यों और गिरफ्तारी प्रक्रिया को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। दोनों मामलों की सुनवाई न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने की।
POCSO केस में आरोपी बरी
चंपावत जिले के रीठा साहिब थाना क्षेत्र से जुड़े नाबालिग छेड़छाड़ और पॉक्सो अधिनियम के मामले में हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए आरोपी को बाइज्जत बरी कर दिया।
मामला फरवरी 2024 का है, जिसमें आरोपी पर 17 वर्षीय किशोरी से छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया था। निचली अदालत ने उसे 4 साल की सजा सुनाई थी।
हालांकि हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पाया गया कि पीड़िता के बयानों में स्पष्ट विरोधाभास है। अपने मुख्य बयान में पीड़िता ने केवल गाली देने और ₹500 फेंकने की बात कही, जबकि छेड़छाड़ या यौन हमले की स्पष्ट पुष्टि नहीं की।
अदालत ने कहा कि धारा 164 CrPC के तहत दर्ज बयान स्वतंत्र साक्ष्य नहीं होते और जब मुख्य गवाही ही कमजोर हो,
तो केवल पूर्व बयानों के आधार पर सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। साथ ही, घटना के बावजूद कोई स्वतंत्र गवाह भी पेश नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा कि अपराध ‘संदेह से परे’ साबित नहीं हुआ, इसलिए आरोपी को बरी किया जाना उचित है।
गिरफ्तारी प्रक्रिया पर हाईकोर्ट का फैसला
वहीं, “रविकांत बनाम CBI” मामले में हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी प्रक्रिया को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि उसकी गिरफ्तारी अवैध है क्योंकि उसे गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में नहीं बताए गए, जो अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन है।
इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि गिरफ्तारी मेमो में आरोपों का सार और संबंधित धाराओं का उल्लेख कर आरोपी को दिया गया है, तो इसे संवैधानिक प्रावधानों का पालन माना जाएगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘गिरफ्तारी के कारण’ और ‘गिरफ्तारी के आधार’ अलग-अलग होते हैं। इस मामले में IPC की धाराएं (120-बी, 420, 467, 468, 471) और FIR का विवरण गिरफ्तारी मेमो में शामिल था, जो पर्याप्त है।
क्या है आरोप,
सीबीआई के अनुसार, रविकांत और उनकी पत्नी पर देहरादून में एक कंपनी की जमीन बेचने के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लोगों से ठगी करने का आरोप है। आरोपी ने खुद को कंपनी का निदेशक बताकर लोगों को गुमराह किया।
हाईकोर्ट के इन दोनों फैसलों ने स्पष्ट किया है कि सजा के लिए मजबूत और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं, जबकि गिरफ्तारी में लिखित रूप में आरोपों की जानकारी देना संवैधानिक प्रक्रिया का पालन माना जाएगा।



