बिग ब्रेकिंग: इलेक्ट्रॉनिक सबूत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त। धारा 65-B सर्टिफिकेट जरूरी, आरोपी को मिली राहत

बिग ब्रेकिंग: इलेक्ट्रॉनिक सबूत पर सुप्रीम कोर्ट सख्त। धारा 65-B सर्टिफिकेट जरूरी, आरोपी को मिली राहत

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B के तहत अनिवार्य सर्टिफिकेट के बिना कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को सबूत के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी को बरी कर दिया।

जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि जब तक इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के साथ धारा 65-B के तहत प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक ऐसे रिकॉर्ड अदालत में वैध सबूत नहीं माने जा सकते।

राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया था। यह मामला वर्ष 2010 में एक महिला की हत्या से जुड़ा था।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पीड़िता के पति ने हत्या की साजिश रचने के लिए अपीलकर्ता के साथ मिलकर अपराध को अंजाम दिया।

इस कथित साजिश को साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने दोनों आरोपियों के बीच घटना के समय के आसपास बार-बार हुई बातचीत के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) को मुख्य सबूत के रूप में पेश किया था।

इलेक्ट्रॉनिक सबूत के लिए सर्टिफिकेट अनिवार्य

अपीलकर्ता ने अदालत में तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष धारा 65-B (4) के तहत आवश्यक सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने में विफल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सही माना और कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को स्वीकार्य बनाने के लिए यह प्रमाणपत्र कानूनी रूप से अनिवार्य है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि टेलीकॉम कंपनियों के नोडल अधिकारियों की मौखिक गवाही भी इस सर्टिफिकेट की जगह नहीं ले सकती। अदालत ने अपने पूर्व फैसले “अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव गोरंत्याल” का हवाला देते हुए कहा कि यह कानूनी शर्त है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पैसों की बरामदगी और FSL रिपोर्ट पर भी संदेह

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के घर से बरामद बताए गए 46,000 रुपये को भी अविश्वसनीय माना। अदालत ने पाया कि अदालत में गिनती के दौरान रकम 46,145 रुपये निकली, जिससे बरामदगी की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा हो गया।

इसके अलावा आरोपी की कथित खून से सनी शर्ट से जुड़ी FSL रिपोर्ट को भी अदालत ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब्त वस्तुओं की सुरक्षा और देखरेख की “चेन ऑफ कस्टडी” साबित नहीं हो पाई, जिससे फोरेंसिक रिपोर्ट भरोसेमंद नहीं रह जाती।

परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी अधूरी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की ऐसी पूर्ण और ठोस कड़ी स्थापित नहीं कर सका, जो सीधे आरोपी के अपराध की ओर ही इशारा करे।

इसी आधार पर अदालत ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया और निर्देश दिया कि यदि वह किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।