सब्सक्रिप्शन ही सहारा। इंडिपेंडेंट जर्नलिज़्म को सामाजिक समर्थन जरूरी: जस्टिस नागरत्ना
नई दिल्ली के Constitution Club of India में आयोजित International Press Institute (IPI) इंडिया अवॉर्ड फॉर एक्सीलेंस इन जर्नलिज़्म 2025 समारोह में सुप्रीम कोर्ट की जज Justice B. V. Nagarathna ने प्रेस की स्वतंत्रता और आर्थिक दबावों पर गंभीर टिप्पणी की।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि रीडर्स (पाठकों) से चलने वाला प्रेस ही सबसे अधिक स्वतंत्र रह सकता है, क्योंकि कॉर्पोरेट स्वामित्व वाला मीडिया अक्सर आर्थिक निर्भरता के कारण सरकारी प्रभाव के प्रति कमजोर हो जाता है।
रीडर-फंडेड प्रेस क्यों बेहतर?
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि, “रीडर्स से चलने वाला प्रेस हमेशा पब्लिक इंटरेस्ट की सेवा करने और राजनीतिक दबाव से बचने के लिए बेहतर स्थिति में होता है।”
उन्होंने स्वतंत्र पत्रकारिता को “पब्लिक गुड” (सार्वजनिक संपदा) बताया और कहा कि इसे सब्सक्रिप्शन के जरिए समर्थन मिलना चाहिए।
उनका तर्क था कि अच्छी पत्रकारिता केवल सद्भावना पर नहीं चल सकती। जब कोई पाठक सदस्यता लेता है, तो वह दरअसल यह कहता है कि वह इस तरह की रिपोर्टिंग को ज़िंदा देखना चाहता है।
आर्थिक दबाव: प्रेस की आज़ादी के लिए बड़ा खतरा
जस्टिस नागरत्ना ने चेताया कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए सबसे गंभीर खतरे सीधे सेंसरशिप से नहीं, बल्कि आर्थिक और नियामकीय दबावों से पैदा होते हैं।
उन्होंने संविधान के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि,
- Article 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
- Article 19(1)(g) पेशे की स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
- Article 19(2) के तहत सीधे प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
- लेकिन Article 19(6) के तहत आर्थिक और रेगुलेटरी उपायों को सही ठहराया जा सकता है।
उनके अनुसार, असली खतरा यहीं से पैदा होता है।
किन तरीकों से असर पड़ सकता है?
- ओनरशिप नियम
- लाइसेंसिंग कानून
- टैक्स नीति
- सरकारी और पब्लिक सेक्टर विज्ञापन
- एंटीट्रस्ट कानून
उन्होंने कहा कि, “कानून प्रेस को चुप नहीं करा सकता, लेकिन वह उन परिस्थितियों को आकार दे सकता है जिनके तहत स्पीच बनाई जाती है।”
विज्ञापन और सरकारी प्रभाव
जस्टिस नागरत्ना ने खास तौर पर सरकारी विज्ञापन प्रणाली पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कोई मीडिया संस्थान कानूनी रूप से सरकार की आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हो सकता है, लेकिन यदि उसका बड़ा राजस्व सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है, तो आलोचना करना आर्थिक रूप से महंगा या अस्थिर हो सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि, “अगर प्रेस की आज़ादी प्रतिस्पर्धी बाज़ार में आर्थिक लाभ पर निर्भर करती है, तो क्या वह सच में स्वतंत्र रह सकती है?”
“सेलेक्टिव जर्नलिज़्म” पर चेतावनी
उन्होंने प्रेस पर “कब्ज़ा” करने की कोशिशों के आर्थिक और राजनीतिक दोनों आयामों की ओर इशारा किया और “सेलेक्टिव जर्नलिज़्म” के उभरने पर चिंता जताई।
उनका कहना था कि, स्वतंत्र प्रेस आदेश से नहीं बनता
यह पाठकों, लेखकों और संपादकों के बीच संवाद से विकसित होता है। केंद्रीकृत नियंत्रण (राजनीतिक या नौकरशाही) उसकी जीवंतता को कमजोर करता है
ग्राउंड रिपोर्टिंग की सराहना
इस समारोह में Scroll.in की रिपोर्टर Vaishnavi Rathore को ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर उनकी ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए सम्मानित किया गया।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पर्यावरण और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों पर रिपोर्टिंग संवैधानिक मूल्यों को ज़मीन पर लागू करने में अहम भूमिका निभाती है।
जस्टिस नागरत्ना का भाषण कुछ स्पष्ट संदेश देता है।
- प्रेस की स्वतंत्रता केवल कानूनी गारंटी से सुरक्षित नहीं रहती।
- आर्थिक संरचना और स्वामित्व मॉडल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
- पाठकों का सीधा समर्थन ही पत्रकारिता की वास्तविक स्वतंत्रता सुनिश्चित कर सकता है।
- राज्य अप्रत्यक्ष आर्थिक नीतियों के ज़रिए भी संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है।
अंत में उन्होंने कहा कि, “आज पत्रकारिता का सम्मान करते हुए हम एक गहरे संवैधानिक मूल्य प्रेस की आज़ादी का भी सम्मान करते हैं, जो सच को लोगों तक पहुंचाती है और यह सुनिश्चित करती है कि भविष्य के हित आज की सुविधाओं से दब न जाएं।”



