अपील में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त। हत्या के दोषी की उम्रकैद सस्पेंड, हाईकोर्ट का आदेश रद्द
नई दिल्ली। अपीलों की सुनवाई में अत्यधिक देरी को गंभीर न्यायिक चिंता बताते हुए Supreme Court of India ने ओडिशा हाईकोर्ट का वह आदेश रद्द कर दिया है, जिसमें हत्या के एक दोषी की उम्रकैद की सज़ा सस्पेंड करने से इनकार किया गया था।
शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि अपील का निपटारा वर्षों तक लंबित रहे तो दोषी को सज़ा सस्पेंड करने का लाभ दिया जाना चाहिए, बशर्ते देरी उसके कारण न हो।
मामले में आरोपी मुना बिसोई को सेशंस कोर्ट ने Indian Penal Code, 1860 की धारा 302/34 और Arms Act, 1959 की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। आरोपी ने 2016 में अपनी सज़ा के खिलाफ Odisha High Court में अपील दायर की थी, जो अब तक लंबित है।
22 अक्टूबर 2025 को हाईकोर्ट ने सज़ा पूरी तरह सस्पेंड करने से इनकार करते हुए केवल तीन महीने की अंतरिम ज़मानत दी थी। उस समय तक आरोपी 11 साल से अधिक अवधि जेल में बिता चुका था। अंतरिम ज़मानत की अवधि समाप्त होने से पहले उसने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एस.सी. शर्मा की पीठ ने कहा कि भले ही व्यक्ति को हत्या जैसे जघन्य अपराध में दोषी ठहराया गया हो, लेकिन अपील की सुनवाई में असाधारण देरी होने पर सज़ा सस्पेंड करने के उसके अधिकार को खारिज नहीं किया जा सकता।
पीठ ने यह भी नोट किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि अपील के निपटारे में देरी आरोपी की वजह से हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में Kashmira Singh v. State of Punjab का हवाला दिया। 1977 के इस ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने कहा था कि यदि अपील वर्षों तक लंबित रहे और व्यक्ति जेल में बंद रहे, तो यह न्याय का मज़ाक होगा।
अदालत ने तब यह भी कहा था कि यदि अपील समय पर सुनना संभव न हो, तो सामान्यतः दोषी को ज़मानत दी जानी चाहिए, जब तक कि इसके विपरीत कोई ठोस कारण न हो।
इन सिद्धांतों को दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सेशंस कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सज़ा को सस्पेंड कर दिया और हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को पूर्ण रूप से लागू कर दिया।
साथ ही ओडिशा हाईकोर्ट को निर्देश दिया गया कि आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर अपील का अंतिम निपटारा किया जाए।
यह फैसला लंबित आपराधिक अपीलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर उन मामलों में जहां दोषी लंबे समय से जेल में बंद हैं और अपीलों की सुनवाई में असामान्य देरी हो रही है।



