हाईकोर्ट का बड़ा फैसला। बर्खास्त सिविल जज दीपाली शर्मा बहाल, सभी सेवा लाभ देने के आदेश
नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हरिद्वार की बर्खास्त सिविल जज (सीनियर डिवीजन) दीपाली शर्मा की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए उन्हें सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दीपाली शर्मा को बर्खास्तगी की तिथि से निरंतर सेवा में माना जाएगा और उन्हें वरिष्ठता सहित सभी देय सेवा लाभ प्रदान किए जाएंगे। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने 50 प्रतिशत वेतन एवं अन्य सेवा लाभ देने के निर्देश भी जारी किए हैं।
दीपाली शर्मा की नियुक्ति वर्ष 2008 में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर हुई थी। उच्च न्यायालय की फुल कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2020 को एक प्रस्ताव पारित कर उन्हें पद से हटाने का निर्णय लिया था, जिसके अनुपालन में राज्य सरकार ने 20 अक्टूबर 2020 को बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया था।
इस निर्णय को दीपाली शर्मा ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद 6 जनवरी को बहाली का आदेश पारित किया, जिसकी प्रति शुक्रवार को प्राप्त हुई।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को पद से हटाए जाने की तिथि से निरंतर सेवा में माना जाएगा और उन्हें सभी संबंधित लाभ दिए जाएंगे।
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता आदित्य प्रताप सिंह ने बताया कि यह मामला वर्ष 2018 में शुरू हुआ था, जब उच्च न्यायालय को एक गुमनाम शिकायत प्राप्त हुई थी।
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि दीपाली शर्मा ने एक 14 वर्षीय नाबालिग लड़की को घरेलू काम के लिए रखा है और उसके साथ मारपीट तथा भोजन न देने जैसे कृत्य किए जा रहे हैं।
इन आरोपों की जांच के लिए हाईकोर्ट ने अतिरिक्त जिला न्यायाधीश स्तर के एक अधिकारी को जांच अधिकारी नियुक्त किया था।
जांच रिपोर्ट में दीपाली शर्मा को दोषी नहीं पाया गया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कड़े शब्दों में कहा कि लगाए गए सभी आरोप और निकाले गए निष्कर्ष रिकॉर्ड के विपरीत और गलत प्रकृति के थे। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की ओर से बर्खास्तगी के लिए कोई वैध स्वीकृति रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं थी।
अदालत ने यह भी नोट किया कि संबंधित नाबालिग लड़की और उसके पिता ने बाल श्रम से जुड़े सभी आरोपों से स्पष्ट रूप से इनकार किया था। इसके अलावा, उत्तराखंड सरकारी कर्मचारी नियम, 2002 के तहत जांच के दौरान बाल श्रम का कोई आरोप विधिवत रूप से स्थापित ही नहीं किया गया था।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने न केवल दीपाली शर्मा को न्यायिक सेवा में पुनः बहाल किया है, बल्कि यह भी स्पष्ट संदेश दिया है कि अनुशासनात्मक कार्रवाई तथ्यों, नियमों और प्रक्रिया के अनुरूप ही की जानी चाहिए।



