बिग ब्रेकिंग: जजों के महाभियोग की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की कसौटी, वर्मा मामले में निर्णय सुरक्षित

जजों के महाभियोग की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की कसौटी, वर्मा मामले में निर्णय सुरक्षित

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 8 जनवरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा दायर रिट याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

इस याचिका में उन्होंने Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत उनके खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा गठित जांच समिति को चुनौती दी है। मामले की सुनवाई जस्टिस दिपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने की।

एक दिन पहले सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा था कि जांच समिति के गठन में “कुछ खामी” नजर आती है और इस पर विचार किया जाएगा कि क्या यह खामी इतनी गंभीर है कि पूरी कार्यवाही को ही रद्द किया जाए। इससे पहले 16 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय को नोटिस जारी किया था।

याचिका का मुख्य तर्क

याचिका में कहा गया है कि 21 जुलाई को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही दिन महाभियोग प्रस्ताव पेश किए गए थे।

इसके बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा अध्यक्ष के निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना और आवश्यक संयुक्त परामर्श के बिना एकतरफा जांच समिति का गठन कर दिया। इसे Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 3(2) और उसके प्रावधानों का उल्लंघन बताया गया है।

धारा 3(2) के अनुसार, यदि दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाते हैं, तो समिति का गठन तभी हो सकता है जब दोनों सदनों द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किया जाए और ऐसा गठन लोकसभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा संयुक्त रूप से किया जाए।

उपसभापति की भूमिका पर विवाद

सुनवाई के दौरान बताया गया कि 11 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति ने महाभियोग प्रस्ताव को खारिज कर दिया था और इसके अगले दिन 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ने जांच समिति का गठन किया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उपसभापति को प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार ही नहीं था, इसलिए उसके आधार पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा समिति का गठन अवैध है।

यह प्रश्न भी उठाया गया कि क्या तत्कालीन राज्यसभा अध्यक्ष जगदीप धनखड़ ने प्रस्ताव मिलने के पहले ही दिन उसे स्वीकार कर लिया था। यदि ऐसा था, तो उपसभापति बाद में प्रस्ताव को खारिज नहीं कर सकते थे और समिति का गठन संयुक्त रूप से होना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 124 महाभियोग प्रक्रिया के संदर्भ में एक “पूर्ण कोड” है और अनुच्छेद 91 के आधार पर उपसभापति को वह अधिकार नहीं मिल सकता, जो Judges (Inquiry) Act के तहत विशेष रूप से अध्यक्ष को दिए गए हैं।

सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने भी तर्क दिया कि नए राज्यसभा अध्यक्ष की नियुक्ति तक प्रतीक्षा की जा सकती थी। हालांकि, पीठ ने इस दलील पर संदेह जताते हुए कहा कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के अभाव में उनके कार्य कर सकते हैं, तो उपसभापति अध्यक्ष के अभाव में उनके कार्य क्यों नहीं कर सकते।

इस पर रोहतगी ने कहा कि संविधान में ऐसी स्पष्ट व्यवस्था है, जबकि Judges (Inquiry) Act में उपसभापति को ऐसा अधिकार नहीं दिया गया है।

रोहतगी ने यह भी कहा कि जब एक सदन ने प्रस्ताव खारिज कर दिया, तो दूसरा सदन उसी आधार पर जांच आगे नहीं बढ़ा सकता। पीठ ने इस तर्क को अधिनियम को “अव्यावहारिक” बनाने वाला बताते हुए कहा कि इससे प्रक्रिया के दुरुपयोग का रास्ता खुल सकता है।

लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय का पक्ष

लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि धारा 3(2) का उद्देश्य दो अलग-अलग जांच समितियों के गठन से बचना है।

उन्होंने दलील दी कि कानून की मंशा यह सुनिश्चित करना है कि एक ही प्रस्ताव पर एक ही जांच हो और परस्पर विरोधी निष्कर्ष न निकलें। उनके अनुसार, याचिकाकर्ता को किसी प्रकार का ठोस पूर्वाग्रह नहीं हुआ है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 14 मार्च को जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक हिस्से में आग बुझाने के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी मिलने से जुड़ा है। इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजय खन्ना ने तीन न्यायाधीशों की इन-हाउस जांच समिति गठित की थी।

समिति की रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया दोष पाए जाने पर मामला राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजा गया। जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया और जांच लंबित रहने तक उनका न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही इन-हाउस जांच और तत्कालीन सीजेआई की सिफारिश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर चुका है।

अब सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि जांच समिति के गठन में बताई गई कथित खामी इतनी गंभीर है या नहीं कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप किया जाए।