उत्तराखंड में डर, अफवाह और दहशत। पाँच घटनाएँ और सवालों के घेरे में सिस्टम
उत्तराखंड। हिमालय की गोद में बसा वह शांत प्रदेश, जहां जंगलों की सरसराहट और नदियों की कलकल कभी जीवन-संगीत हुआ करती थी। लेकिन आज यही जंगल चीखों, दहशत और संघर्ष की नई कहानी लिख रहे हैं।
राज्य में मानव–वन्यजीव संघर्ष अब भयावह मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां कभी इंसान और जानवर harmoniously सह-अस्तित्व में थे, वहां अब खून बिखरा है, डर है, और एक खामोश चेतावनी भी।
राजाजी टाइगर रिजर्व: रेलवे ट्रैक पर शहीद होता जंगल का बच्चा
राजाजी टाइगर रिजर्व की मोतीचूर रेंज में 5–7 साल के शिशु हाथी की ट्रेन से कटकर मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। हाथी का झुंड जंगल से निकलकर रेलवे ट्रैक पार कर रहा था।
धुंध इतनी घनी थी कि हावड़ा–देहरादून एक्सप्रेस का चालक हाथियों को समय रहते देख भी नहीं पाया। इमरजेंसी ब्रेक भी कारगर नहीं हुई और मासूम हाथी इंजन के नीचे समा गया। लगभग दो घंटे तक ट्रेनें रुकी रहीं।
वन विभाग का दावा है कि, हादसे के बाद गश्त बढ़ाई गई है। लेकिन सवाल यह है कि सालों से हाथियों का माइग्रेशन रूट होने के बावजूद रेलवे सुरक्षा उपाय क्यों नहीं बढ़ा?
लापरवाही इतनी स्पष्ट थी कि वन विभाग ने लोको पायलट खुशी राम मौर्य और सहायक लोको पायलट दीपक कुमार पर मुकदमा तक दर्ज कर लिया। यह सिर्फ एक हादसा नहीं: यह जंगल की चीख है, जिसे सुनने में हम लगातार नाकाम रहे हैं।
अमानगढ़ टाइगर रिज़र्व: टस्कर का पीछा और पर्यटकों की दहशत
बिजनौर के अमानगढ़ टाइगर रिजर्व से निकले वीडियो में एक टस्कर हाथी अचानक सफारी जिप्सी की ओर दौड़ पड़ता है।
पर्यटकों की सांसें अटक जाती हैं,
“भगाओ… भगाओ… प्लीज़… हाथी आ रहा है…”
जंगल के बीच गूंजती आवाजें उस भय को जिंदा कर देती हैं, जो मनुष्य और वन्यजीव के आपसी टकराव का नया चेहरा बनता जा रहा है।
नेचर गाइड बताते हैं:-
“जंगल में गलती की कोई गुंजाइश नहीं होती। टस्कर किसी भी आवाज, गंध या हलचल से उत्तेजित हो सकता है।” यह घटना बताती है कि जंगल अपना क्षेत्र नहीं बदल रहे… हम उनके क्षेत्र में और भीतर तक धंसते जा रहे हैं।
पूरे उत्तराखंड में 800 से ज्यादा डेंजर जोन
वन विभाग की रिपोर्ट बेहद खतरनाक तस्वीर पेश करती है, उत्तराखंड के 800 इलाकों को मानव–वन्यजीव संघर्ष के लिहाज से रेड ज़ोन घोषित किया जा चुका है। कभी इंसान जंगलों में जाते थे, आज जंगल इंसानी बस्तियों तक आ रहे हैं। कारण साफ है कि,
- बढ़ता शहरीकरण
- वनों का सिकुड़ना
- माइग्रेशन रूट पर निर्माण
- मानव गतिविधियां
- कूड़ा, भोजन के अवशेष जंगलों में फेंकना
- खेतों में छोड़े गए मवेशियों के शव
- सड़कों, रेलमार्गों का जंगलों को चीरना
राजाजी टाइगर रिजर्व के ऑनरेरी वार्डन राजीव तलवार कहते हैं कि, “गलती इंसानों की ही है। भोजन की गंध, कूड़ा और अवैध गतिविधियों से वन्य जीव बस्तियों की ओर आकर्षित होते जा रहे हैं।”
भालू: पहाड़ों का नया आतंक
साल 2025 में भालुओं के हमले 74 तक पहुंच चुके हैं।
5 लोगों की मौत, 69 घायल ये आंकड़े पहाड़ की शांत वादियों में बढ़ते खून-खराबे की कहानी बयां करते हैं।
चार बड़े डेंजर जोन चिन्हित
- बदरीनाथ फॉरेस्ट डिवीजन
- पौड़ी फॉरेस्ट डिवीजन
- रुद्रप्रयाग फॉरेस्ट डिवीजन
- नंदा देवी फॉरेस्ट डिवीजन
सर्दियों में भोजन की कमी भालुओं को गांवों की ओर खींच लाती है। कई जगह तो भालू दरवाजे खोलकर घरों में घुसने लगे हैं।
बाघ: कुमाऊं–गढ़वाल में मौत की धमक
साल 2025 में बाघों ने 12 लोगों की जान ली और कईयों को घायल किया। कुमाऊं में तराई ईस्ट, तराई वेस्ट और रामनगर डिवीजन सबसे संवेदनशील हैं। गढ़वाल में राजाजी टाइगर रिजर्व से सटे इलाकों और लैंसडाउन का कुछ हिस्सा खतरे में है।
जंगलों में घास लेने गई महिलाएं हों या खेतों में काम कर रहे लोग, सब बाघों के लिए आसान शिकार बन जाते हैं।
गुलदार: हर जिले में दहशत
गुलदार उत्तराखंड की सबसे बड़ी चिंता बन चुका है
राज्य के 13 में 13 जिलों में सक्रिय।
साल 2025 में अब तक 12 मौतें, 88 लोग घायल अल्मोड़ा, पौड़ी, चंपावत, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी सबसे संवेदनशील क्षेत्र हैं। रात में लोग मशाल जलाकर गांवों की पहरेदारी कर रहे हैं।
हाथी, सांप और ततैया, तीन और बड़े खतरे
हाथी लगातार गांवों और खेतों में घुसकर उत्पात मचा रहे हैं। 2020–2025 केवल तीन डिवीजनों में सर्पदंश की 109 घटनाएं 16 मौतें। पूरे राज्य में 3 साल में 85 मौतें सर्पदंश से। ततैया/मधुमक्खियों के हमले इतने बढ़े कि मुआवजा तय करना पड़ा।
सरकार की नई मुआवजा नीति
27 नवंबर 2025 की धामी कैबिनेट ने बड़ा फैसला लिया। मानव–वन्य जीव संघर्ष में मौत पर मुआवजा बढ़ाकर ₹10 लाख कर दिया गया है।
लेकिन सवाल यह भी है कि,
क्या मुआवजा उन जिंदगियों की भरपाई कर सकता है जो हर महीने जंगल संघर्ष की भेंट चढ़ रही हैं?
वन विभाग की रणनीति- कितनी कारगर?
पीसीसीएफ आरके मिश्रा के अनुसार
- सभी डेंजर जोन चिन्हित
- मॉनिटरिंग बढ़ाई
- ट्रैप कैमरा, पेट्रोलिंग, एवॉइडेंस टीम सक्रिय
- गंभीर क्षेत्रों में सुरक्षा उपाय बढ़ाए गए
लेकिन आंकड़े बताते हैं कि, संघर्ष कम नहीं, बल्कि बढ़ रहा है।
जंगल और इंसान के बीच की यह जंग अब निर्णायक मोड़ पर
उत्तराखंड के जंगलों में आज कोई भी प्रजाति सुरक्षित नहीं है, न इंसान, न जानवर।
मानव–वन्यजीव संघर्ष राज्य के विकास मॉडल और जंगल प्रबंधन दोनों को कटघरे में खड़ा कर रहा है। रेलवे ट्रैक पर कटता हाथी हो, सफारी में पीछा करता टस्कर, या गांवों में हमला करते गुलदार ये सब यह इशारा हैं कि,
जंगल हमसे नहीं लड़ रहा, हम जंगल को धकेल रहे हैं।
राज्य को तत्काल
- वैज्ञानिक वन प्रबंधन
- सुरक्षित कॉरिडोर
- रेलवे–रोड पर अंडरपास/ओवरपास
- गांवों में जागरूकता
- कूड़ा प्रबंधन
- माइग्रेशन रूट संरक्षित करने
जैसे कदम तेजी से उठाने होंगे।
क्योंकि यदि इंसान और वन्यजीव की यह लड़ाई ऐसे ही जारी रही तो आने वाले समय में उत्तराखंड मनोरम पहाड़ों का नहीं, संघर्ष के घावों का प्रदेश बनकर रह जाएगा।



