लोकतंत्र का सच, जमीनी जुड़ाव के साथ। भाजपा के दिग्गजों के जनता ने दिखाया आईना, रिश्तेदारों की करारी हार
देहरादून। उत्तराखंड पंचायत चुनाव 2025 के नतीजे सत्ता के गलियारों में हलचल मचा रहे हैं। इस बार जनता ने नेताओं के रिश्तों को नहीं, प्रत्याशियों की छवि, काम और भरोसे को वोट दिया। बीजेपी के कई प्रभावशाली नेताओं के परिजन चुनावी मैदान में बुरी तरह से हार गए – और ये हार सिर्फ सीट नहीं, बल्कि सियासी संदेश भी लेकर आई है।
लैंसडाउन विधायक दलीप रावत की पत्नी को हार का सामना
पौड़ी गढ़वाल जिले से जिला पंचायत सदस्य पद पर उतरीं विधायक दलीप रावत की पत्नी नीतू देवी को जनता ने नकार दिया। नीतू देवी को 411 वोटों से हार का सामना करना पड़ा। योजना थी कि वो जीतकर जिला पंचायत अध्यक्ष बनेंगी, लेकिन पहले पायदान पर ही हार ने रास्ता रोक दिया। इससे दलीप रावत की साख को झटका लगा है।
सल्ट विधायक महेश जीना का बेटा भी हारा
अल्मोड़ा जिले में सल्ट विधायक महेश जीना के बेटे करन जीना को बबलिया क्षेत्र पंचायत सीट से हार का सामना करना पड़ा। ये हार साफ इशारा करती है कि जनमानस अब विधायक पुत्रों की उम्मीदवारी को आसानी से स्वीकार नहीं कर रहा।
सरिता आर्या के बेटे को कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार ने दी शिकस्त
नैनीताल की भवालीगांव सीट से विधायक सरिता आर्या के बेटे को कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी यशपाल आर्या ने 1200 वोटों से हराया। दिलचस्प बात ये रही कि सरिता पहले कांग्रेस में थीं और बीजेपी में जाकर विधायक बनीं, लेकिन जनता ने उनके बेटे को नकार दिया।
अल्मोड़ा में पति-पत्नी दोनों की हार
भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के मंडल अध्यक्ष संतोष कुमार राम और उनकी पत्नी पूजा देवी दोनों ही अलग-अलग सीटों से चुनाव हारे। दोनों ही तीसरे स्थान पर रहे। संगठन की पकड़ और जमीनी संपर्क दोनों सवालों के घेरे में हैं।
पूर्व मंत्री राजेंद्र भंडारी की पत्नी को भी जनता ने नकारा
चमोली जिले के दिग्गज नेता और पूर्व मंत्री राजेंद्र भंडारी की पत्नी रजनी भंडारी को भी पंचायत चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा। वह निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष थीं, लेकिन इस बार जनता ने भरोसा नहीं जताया।
बेला तोलिया की छवि नहीं बचा पाई सीट
नैनीताल में भाजपा की निवर्तमान जिला पंचायत अध्यक्ष बेला तोलिया भी चुनाव हार गईं। रामड़ी आनसिंह सीट से निर्दलीय प्रत्याशी छवि बोरा कांडपाल ने उन्हें हराकर एक बड़ा उलटफेर किया।
नतीजे क्या कहते हैं?
इन चुनावों ने एक सीधा संदेश दिया है। जनता अब नेताओं के रिश्तेदारों को आंख मूंदकर वोट नहीं देती। मतदाता अब नाम नहीं, काम देखता है। पंचायत स्तर पर ये झटके कहीं न कहीं बीजेपी के लिए चेतावनी हैं कि यदि संगठन और चेहरे में बदलाव नहीं हुआ, तो 2027 में भी मुश्किलें इंतजार कर रही हैं।




