बड़ी खबर: खाद्य पदार्थों में मिलावट पर मानवाधिकार आयोग में खाद्य सचिव जवाब-तलब

खाद्य पदार्थों में मिलावट पर मानवाधिकार में खाद्य सचिव जवाब-तलब

स्पेक्स संस्था द्वारा देहरादून में खाद्य पदार्थों में मिलावट वाले आंकड़े सार्वजनिक किए जाने के बाद इसकी जांच कराए जाने की मांग वाली जनहित याचिका मानवाधिकार आयोग पहुंचने पर मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्काल इसकी सुनवाई डबल बेंच में की गई।

जस्टिस अखिलेश चंद्र शर्मा तथा सदस्य राम सिंह मीणा द्वारा आदेश पारित किए गए कि, शिकायतकर्ता भूपेन्द्र कुमार लक्ष्मी ने स्पेक्स एनजीओ के सचिव डॉ बृजमोहन शर्मा की रिपोर्ट द्वारा मिलावट के परीक्षण के लिए चलाये गये अभियान में सरसों के तेल के 469 नमूनों में से 415 नमूने फेल होने तथा उत्तराखण्ड के 20 स्थानों पर मिलावट की स्थिति होने एवं जनहित में जल्द से जल्द कार्यवाही किये जाने की शिकायत प्रस्तुत की गई है।

न्यायहित में शिकायत की प्रति सचिव खाद्य विभाग उत्तराखण्ड शासन को भेजने व सचिव खाद्य को इस सम्बन्ध में जांच कर अपनी आख्या चार सप्ताह में आयोग के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं।

ये था मामला

बताते चलें कि, उत्तराखंड के जिला देहरादून के प्रेस क्लब में स्पेक्स एनजीओ के सचिव डॉ.बृजमोहन शर्मा द्वारा 28-10-2021 को प्रैस वार्ता आयोजित कर जानकारी दी गई कि, उनके द्वारा जून से सितंबर, 2021 तक सरसों के तेल में मिलावट के परीक्षण के लिए अभियान शुरू किया गया, जिसमें स्पेक्स से जुडे़ स्वयं सेवकों ने उत्तराखंड के 20 स्थानों जैसे देहरादून, विकासनगर, डोईवाला, मसूरी, टिहरी, उत्तरकाशी, ऋषिकेश, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, जोशीमठ, गोपेश्वर, हरिद्वार, जसपुर, काशीपुर, रुद्रपुर, राम नगर, हल्द्वानी, नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ से 469 नमूने एकत्र किए, जिनमें से 415 नमूने मिलावटी पाए गए।

उत्तराखंड के 20 स्थानों पर सरसों के तेल में मिलावट की स्थिति। जहाँ मसूरी, रुद्रप्रयाग, जोशीमठ, गोपेश्वर और अल्मोड़ा में सरसों के तेल के नमूनों में शत-प्रतिशत मिलावट पाई गई, वहीं जसपुर में न्यूनतम मिलावट 40% , काशीपुर में 50% पाई गई।

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उत्तरकाशी में 95%, देहरादून 94%, पिथौरागढ़ 91%, टिहरी 90%, हल्द्वानी 90%, विकास नगर 80%, डोईवाला 80%, नैनीताल 71%, श्रीनगर 80%, ऋषिकेश 75%, राम नगर 67%, हरिद्वार 65%, रुद्रपुर में 60 प्रतिशत मिलावट पाई गई।

उपरोक्त नमूनों में पीले रंग यानी मेटानिल पीला, सफेद तेल, कैटर ऑयल, सोयाबीन और मूंगफली जिसमें सस्ते कपास के बीज का तेल होता है, और हेक्सेन की मिलावट का अधिक प्रतिशत पाया गया।

बड़ी संख्या में स्वास्थ्य समस्याओं का कारण हमारे द्वारा खाया जाने वाला भोजन ही है और यह हमेशा मांस या सब्जियों की गुणवत्ता के बारे में नहीं होता है बल्कि भोजन के तेल की गुणवत्ता के बारे में भी होता है।

सरसों के तेल में सस्ते आर्जीमोन तेल की मिलावट पाई जाती है जिससे जल शोथ (Ascites) रोग होते हैं,इसके लक्षणों में पूरे शरीर में सूजन, विशेष रूप से पैरों में और पाचनतंत्र संबंधी समस्याएं जैसे उल्टी, दस्त और भूख न लगना शामिल हैं, ऐसे में थोड़ी सी भी मिलावट जलन पैदा कर सकती है, जो कि उस समय तो कोई बड़ी बात नहीं लगती, परन्तु लंबे समय में इसके गंभीर प्रभाव हो सकते हैं।

पत्रकार भूपेन्द्र कुमार ने इस प्रकरण में मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड में जनहित याचिका दायर कर कहा कि उपरोक्त प्रकरण बहुत ही गंभीर है और स्पष्ट रूप से आम जनता की जानमाल की हानि से जुड़ा हुआ है, इसलिए शिकायत पर तत्काल सुनवाई करते हुए कार्यवाही की झाए।

साथ ही जल्द मामले की रिपोर्ट मंगवा कर कार्यवाही के लिए निर्देशित किया जाए। मानवाधिकार आयोग उत्तराखंड द्वारा मामले की गंभीरता को देखते हुए मामले की सुनवाई तत्काल डबल बैंच में की गई। बहरहाल, अब देखना यह है कि, मामले में क्या तथ्य निकलकर आते हैं!