फर्जी फल उत्पादन के आंकड़ों के कारण ज्यादातर खाद्य प्रसंस्करण यूनिटें बन्द हुई

फर्जी फल उत्पादन के आंकड़ों के कारण ज्यादातर खाद्य प्रसंस्करण यूनिटें बन्द हुई

 

देहरादून। यदि जनपद वार फल उत्पादन की विस्तृत जानकारी ली जाय तो टिहरी जनपद में 20,942 हैक्टियर क्षेत्र फलों के अन्तर्गत दर्शाया गया है, तथा फलों का उत्पादन 28,510 MT दिखाया गया है। जब कि, वास्तविकता यह है कि, चम्बा मसूरी फल पट्टी, काणाताल, धनौल्टी, मगरा, प्रताप नगर, मांजफ आदि क्षेत्रों में लगे पुराने सेब के बाग समाप्त हो चुके हैं। यदि कहीं पर सेब के बाग दिखाई भी देते हैं तो वे un productive हैं। नये सेब के बाग लगाये गये किन्तु गलत नियोजन एवं गलत क्रियान्वयन के कारण सफलता नहीं मिली। सेब में भी उत्पादन बहुत अधिक दर्शाया गया है। सेब के पुराने बाग नष्ट हो चुके हैं। नये बाग लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं, किन्तु सफलता नहीं मिल पा रही है।

पौडी जनपद में भी पौड़ी, खाण्यू सैण, खिर्सू, भरसार, थलीसैण, धूमाकोट आदि छेत्रों में लगे पुराने सेब के बाग समाप्त हो चुके हैं। नये सेब के बाग विभिन्न योजनाओं में लगाये गये किन्तु वे विकसित नहीं हो पा रहे हैं। नाशपाती, आडू, प्लम, खुवानी, अखरोट के बाग कम ही हैं, जो un productive हैं या जिनमें उत्पादकता बहुत ही कम है। फिर भी फल पौध के अंतर्गत 20,781 हैक्टेयर तथा उत्पादन 33,330 MT दर्शाया गया है, यही स्थिति फल उत्पादन मे अन्य पर्वतीय जनपदों की भी है ।

 

उत्तरकाशी जनपद व राज्य के हिमाचल से लगे अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तथा पिथौरागढ़, चमोली जनपदों के बहुत अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्र जो हिमालय के समीप है, उन क्षेत्रों में सेब का अच्छा उत्पादन हो रहा है तथा सेब के कुछ नये बाग भी विकसित हुये है। नैनीताल जनपद के रामगढ़ क्षेत्र में कृषकों ने सेब के पेड़ हटा कर आड़ू, प्लम, नाशपाती के अच्छे बाग विकसित किए हैं। जिनसे अच्छा उत्पादन मिल रहा है। सेब में रायमर व जौनाथन (केनिंग) किस्मों का भी अच्छा उत्पादन हो रहा है। इस क्षेत्र में फूड प्रोसेसिंग की तीन-चार छोटी इकाइयां भी चल रही है।

 

वर्ष 2005 से शासन लगातार उद्यान विभाग को फल उत्पादन के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक करने के निर्देश दे रहा है। जिस के अनुपालन में राज्य के सभी जनपदों में राजस्व विभाग से सहयोग ले कर फल उत्पादन के वास्तविक आंकड़े एकत्रित कर निदेशालय भेजे किन्तु 13 वर्षों से अधिक समय व्यतीत होने के बाद भी विभाग द्वारा फल उत्पादन के वास्तविक आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गये हैं। पलायन आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार पौड़ी जनपद में उद्यान विभाग द्वारा फल उद्यान के अन्तर्गत वर्ष 2015-16 में 20301 हैक्टियर क्षेत्रफल दर्शाया गया है। पलायन आयोग के वर्ष 2018-19 सर्वे में पाया गया कि, मात्र 4,042 हैक्टेयर क्षेत्र फल यही स्थिति सभी जनपदों में पाई जायेगी।

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फर्जी फल उत्पादन के आंकड़ों के सहारे लगी ज्यादातर बड़ी खाद्य प्रसंस्करण यूनिटें बन्द हुई

रामगढ नैनीताल में 70 के दशक में एग्रो द्वारा फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई गई थी फ़ल उपलब्ध न होने के कारण बन्द कर दी गयी। इसी प्रकार अल्मोड़ा जनपद के मटेला में 80 के दशक में करोंड़ों रुपए खर्च कर कोल्ड स्टोरेज बना जो आज फल उपलब्ध न होने के कारण बन्द पडा है। रानीखेत चौबटिया गार्डन की एपिल जूस प्रोसिसिग यूनिट बन्द पड़ी है। चमोली जनपद के कर्णप्रयाग में भी 80 के दशक में एग्रो द्वारा फूड प्रोसेसिंग यूनिट खुली और बन्द हुई। रुद्रप्रयाग जनपद के तिलवाड़ा में भी फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई गई वह भी अधिक तर बन्द ही रहती है। उत्तरकाशी व चमोली में भी कोल्ड स्टोरेज बने व बन्द पडे है।

 

कई स्वयं सेवी संस्थाओं एवं परियोजनाओं के माध्यम से फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाई गई, किन्तु फल उपलब्ध न होने के कारण नहीं चल पाई। पर्वतीय क्षेत्रों में कहीं-कहीं पर व्यक्तिगत Small scale prossesing unit लगी है। वे भी हरिद्वार आदि स्थानों से कीनू, संतरा का पल्प जूस इक्ट्ठा कर माल्टा जूस के नाम पर बेच रहे हैं। किसी भी राज्य के सही नियोजन के लिए आवश्यक है कि, उसके पास वास्तविक आंकड़े हों, तभी भविष्य की रणनीति तय की जा सकती है। काल्पनिक (फर्जी) आंकड़ों के आधार पर यदि योजनाएं बनाई जाती है तो उससे आवंटित धन का दुरपयोग ही होगा।