सांप के ज़हर मामले में एल्विश यादव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सबूतों की होगी गहन जांच
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूट्यूबर एल्विश यादव से जुड़े सांप के ज़हर प्रकरण में कहा है कि वह यह जांच करेगा कि Wildlife Protection Act के तहत उन्हें अभियुक्त बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री है या नहीं।
अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कोई लोकप्रिय व्यक्ति प्रचार के लिए “बिना आवाज़ वाले जीव” का इस्तेमाल करता है, तो इससे समाज में बहुत बुरा संदेश जाता है।
मामले की सुनवाई जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ कर रही है। कोर्ट ने राज्य से कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है और सुनवाई 19 मार्च 2026 तक के लिए स्थगित कर दी है।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
पीठ ने कहा,
“हम दो बातों पर विचार करेंगे आपकी भूमिका क्या है और क्या इस कथित अपराध में आपको फंसाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। साथ ही हमें यह भी देखना होगा कि वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत क्या कार्रवाई आवश्यक है।
अगर एक लोकप्रिय व्यक्ति को ऐसे जीव का इस्तेमाल करने दिया जाता है जिसकी कोई आवाज़ नहीं है, तो यह बेहद बुरा संदेश देगा।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि वह क्लोजर रिपोर्ट के प्रभाव की भी जांच करेगा।
हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती
यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के 12 मई 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट,
IPC और NDPS Act के तहत दर्ज मामले में दाखिल चार्जशीट और समन आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया था।
पिछले वर्ष 6 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
आरोप क्या हैं,
आरोप है कि यूट्यूब वीडियो के लिए सांपों और कथित तौर पर सांप के ज़हर का गलत इस्तेमाल किया गया। साथ ही रेव पार्टियों के आयोजन और वहां विदेशी नागरिकों द्वारा सांप का ज़हर एवं अन्य नशीले पदार्थों की आपूर्ति के आरोप भी लगाए गए हैं।
राज्य की ओर से कहा गया कि लोकेशन रिकॉर्ड और सर्विलांस इनपुट से संकेत मिलता है कि आरोपी और अन्य सह-आरोपी कई मौकों पर एक ही स्थान पर मौजूद थे। आरोप यह भी है कि वर्चुअल नंबरों के जरिए संपर्क कर सांपों की सप्लाई की गई।
बचाव पक्ष के तर्क
यादव की वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि बरामद पदार्थ सांप का ज़हर नहीं बल्कि “एंटीबॉडीज़” थे। फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट में चार सामान्य सांपों कोबरा, करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर के लिए एंटीबॉडीज़ पॉजिटिव बताई गईं, न कि ज़हर।
उन्होंने यह भी कहा कि एंटी-स्नेक वेनम का उपयोग ज़हर को निष्क्रिय करने के लिए होता है, न कि नशे के रूप में। NDPS एक्ट के तहत भी एंटीबॉडीज़ शेड्यूल में शामिल नहीं हैं। बचाव पक्ष का तर्क था कि “कानून की किताब में जो अपराध नहीं है, पुलिस उसे गढ़ नहीं सकती।”
इसके अतिरिक्त, IPC की धाराओं 284 और 289 के तहत लगाए गए आरोपों को लेकर कहा गया कि वे एक यूट्यूब वीडियो के आधार पर लगाए गए हैं, जिसमें यादव ने अतिथि भूमिका निभाई थी। उसी वीडियो से संबंधित एक अन्य FIR गुरुग्राम में क्लोजर रिपोर्ट के साथ समाप्त हो चुकी है।
राज्य का पक्ष
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि NDPS एक्ट के शेड्यूल में समय-समय पर नए पदार्थ जोड़े जाते हैं और यह नहीं कहा जा सकता कि यदि कोई पदार्थ सूची में नहीं है तो वह समाज के लिए हानिकारक नहीं हो सकता।
राज्य ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने पुलिस अधिकारियों को वाइल्डलाइफ एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए अधिकृत किया है और संबंधित अधिसूचना रिकॉर्ड पर रखने के लिए समय मांगा।
कोर्ट के प्रमुख सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा:
- यदि सांपों के दांत नहीं थे तो क्या उनसे ज़हर निकाला जा सकता है?
- क्या रेव पार्टियों में ज़हर के इस्तेमाल का ठोस साक्ष्य है?
- क्या वीडियो बनाने के लिए आवश्यक सभी वैधानिक अनुमति ली गई थी?
कोर्ट ने यह भी कहा कि वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 55 के तहत संज्ञान लेने की प्रक्रिया का परीक्षण किया जाएगा।
अगली सुनवाई 19 मार्च को
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को अतिरिक्त सामग्री रिकॉर्ड पर रखने का समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को तय की है।
अब अदालत इस बात पर विचार करेगी कि क्या उपलब्ध साक्ष्य एल्विश यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त हैं और वाइल्डलाइफ कानून के तहत आगे की कार्रवाई किस सीमा तक बनती है।
मामला अब कानूनी और सामाजिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि लोकप्रिय व्यक्तियों के आचरण का व्यापक प्रभाव पड़ता है।



