बिग ब्रेकिंग: ‘आर्टिकल 370’ फिल्म पर मानहानि केस में हाईकोर्ट की रोक, कार्यवाही स्थगित
श्रीनगर/जम्मू। जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने फीचर फिल्म ‘आर्टिकल 370’ से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में फिल्म निर्माता आदित्य धर और अन्य याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ट्रायल कोर्ट में चल रही आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।
यह आदेश जस्टिस मोक्षा खजूरिया काज़मी ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। याचिका में न केवल आपराधिक शिकायत, बल्कि श्रीनगर के फॉरेस्ट मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्री-कॉग्निजेंस समन के आदेश को भी चुनौती दी गई थी।
क्या है पूरा मामला
यह कार्यवाही गुलाम मोहम्मद शाह द्वारा दायर एक आपराधिक शिकायत से शुरू हुई थी। शिकायतकर्ता का आरोप है कि फिल्म ‘आर्टिकल 370’ में याचिकाकर्ताओं ने कथित तौर पर उनकी तस्वीर का इस्तेमाल किया और कहानी में उन्हें आतंकवादी के रूप में दिखाया, जिससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुंचा।
इन आरोपों के आधार पर शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष आपराधिक मुकदमा शुरू करने की मांग की थी। इसके बाद मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 356 के तहत दंडनीय अपराध के लिए प्री-कॉग्निजेंस समन जारी कर दिए थे।
हाईकोर्ट में क्या दलीलें दी गईं
याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सैयद फैसल कादरी ने अदालत में दलील दी कि मजिस्ट्रेट द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया BNSS की धारा 223(1) का स्पष्ट उल्लंघन है।
उन्होंने कहा कि कानून के तहत शिकायत दर्ज होने के बाद मजिस्ट्रेट को शिकायतकर्ता और उपस्थित गवाहों की शपथ पर जांच करनी अनिवार्य है, जिसका लिखित सार रिकॉर्ड में दर्ज होना चाहिए।
दलील दी गई कि इस मामले में न तो शिकायतकर्ता और न ही किसी गवाह का शपथ बयान दर्ज किया गया, फिर भी याचिकाकर्ताओं को समन जारी कर दिए गए। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं को शिकायत,
शपथ पत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की प्रतियां भी उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे उन्हें संज्ञान से पहले सुनवाई का वैधानिक अधिकार नहीं मिल सका।
याचिकाकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट से मंगवाए गए रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि नोटिस जारी करने से पहले BNSS के तहत निर्धारित अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।
पूर्व न्यायिक फैसलों का हवाला
याचिकाकर्ताओं की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2025 SCC OnLine All 4884 में रिपोर्ट किए गए फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि निजी शिकायत के मामलों में पहले
BNSS की धारा 223 के तहत शपथ बयान दर्ज करना अनिवार्य है और उसके बाद ही आरोपी को नोटिस जारी किया जा सकता है।
इस संबंध में केरल हाईकोर्ट समेत अन्य उच्च न्यायालयों के समान विचारों वाले फैसलों का भी उल्लेख किया गया।
हाईकोर्ट का आदेश
सभी दलीलों को सुनने और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने प्रतिवादी को नोटिस जारी किया। साथ ही मामले में अगली सुनवाई तक ट्रायल कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी।
मामले की अगली सुनवाई के लिए 23 मार्च की तारीख तय की गई है।



