2027 में 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा उक्रांद, वो भी ऐसे….
अल्मोड़ा। आगामी विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) ने अपनी सक्रियता तेज कर दी है। पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने स्पष्ट किया है कि, यूकेडी राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी और उत्तराखंड के मूल मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएगी।
हालांकि, इस ऐलान के साथ ही पार्टी के संगठनात्मक ढांचे, सीमित नेतृत्व और जमीनी ताकत को लेकर कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं।
सुरेंद्र कुकरेती ने बीजेपी और कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने उत्तराखंड के मूल स्वरूप से समझौता किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जल, जंगल और जमीन को माफियाओं के हवाले कर दिया गया है, जबकि मूल निवास, सशक्त भू-कानून, गैरसैंण को स्थायी राजधानी और पलायन जैसे मुद्दे आज भी अधूरे हैं।
उनका कहना है कि यूकेडी ही एकमात्र दल है, जो लगातार इन मुद्दों को सड़क से सदन तक उठाता रहा है। हालांकि, राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसकी सीमित नेतृत्व क्षमता और कमजोर सांगठनिक संरचना है।
वर्तमान में पार्टी में गिने-चुने ही चेहरे ऐसे हैं, जो राज्य स्तर पर पहचान रखते हैं। केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती के अलावा, कुछ वरिष्ठ और पुराने नेताओं तक ही पार्टी की पहचान सिमटी नजर आती है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि 70 विधानसभा सीटों पर प्रभावी और जमीनी पकड़ वाले प्रत्याशी पार्टी कहां से लाएगी।
पिछले चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो यूकेडी का जनाधार लगातार सिमटता गया है। वर्ष 2002 में पार्टी ने 4 सीटें जीती थीं, 2007 में यह आंकड़ा घटकर 3 रह गया, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई।
कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने और गुटबाजी के कारण संगठन कमजोर होता गया। इसका सीधा असर बूथ स्तर की सक्रियता और चुनावी तैयारी पर पड़ा है।
हालांकि, यूकेडी नेतृत्व का दावा है कि पार्टी अब नए सिरे से संगठन को खड़ा कर रही है। सुरेंद्र कुकरेती के अनुसार, “एक बूथ, दस युवा” के नारे के साथ युवाओं और महिलाओं को संगठन से जोड़ा जा रहा है।
पार्टी का कहना है कि 2027 तक हर विधानसभा क्षेत्र में स्थानीय मुद्दों से जुड़े नए चेहरे तैयार किए जाएंगे, ताकि प्रत्याशी बाहर से नहीं बल्कि उसी क्षेत्र से उभरें।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूकेडी के लिए यह चुनाव अस्तित्व की लड़ाई साबित हो सकता है। यदि पार्टी केवल घोषणाओं तक सीमित रही और जमीनी स्तर पर मजबूत नेतृत्व खड़ा नहीं कर पाई, तो 70 सीटों पर प्रत्याशी उतारना भी चुनौती बन सकता है।
कई विधानसभा क्षेत्रों में आज यूकेडी के पास न तो सक्रिय कार्यकर्ता हैं और न ही स्पष्ट चेहरा, जो चुनावी मुकाबले में टिक सके।
हालांकि, कुछ क्षेत्रों में आज भी यूकेडी की वैचारिक पकड़ मानी जाती है, खासकर पहाड़ी इलाकों में जहां भू-कानून, पलायन और स्थानीय संसाधनों के संरक्षण जैसे मुद्दे जनता को प्रभावित करते हैं।
यदि पार्टी इन मुद्दों को सही रणनीति, मजबूत स्थानीय नेतृत्व और गठित संगठन के साथ आगे बढ़ाती है, तो वह चुनावी राजनीति में अपनी प्रासंगिकता फिर से साबित कर सकती है।
कुकरेती ने यह भी कहा कि अंकिता भंडारी हत्याकांड, बेरोजगार आंदोलन और भर्ती घोटालों जैसे मामलों में यूकेडी लगातार सड़कों पर रही है और यही उसकी राजनीतिक पूंजी है। पार्टी का दावा है कि जनता पारंपरिक दलों से निराश हो चुकी है और 2027 में एक क्षेत्रीय विकल्प की तलाश में है।
फिलहाल, यह साफ है कि यूकेडी का 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान राजनीतिक संदेश जरूर देता है, लेकिन इसे जमीन पर उतारने के लिए पार्टी को संगठन, नेतृत्व और संसाधनों तीनों मोर्चों पर कड़ी मेहनत करनी होगी।
2027 का चुनाव यह तय करेगा कि उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर राज्य की राजनीति में मजबूती से लौटेगा या यह चुनाव उसके लिए केवल एक संघर्ष बनकर रह जाएगा।



